कानपुर शहर में हुए ‘जाणता राजा’ महानाट्य के आयोजन पर 37,000 रुपये जीएसटी जमा हुआ है। आयोजन समिति ने तिमाही रिटर्न दाखिल करने से पहले ही टैक्स जमा कर दिया। इसके साथ ही शहर में इस महानाट्य का आयोजन कराने वाली संस्था डॉ. हेडगेवार जन्मशताब्दी न्यास की ओर से उत्तर प्रदेश में जीएसटी में स्थायी रजिस्ट्रेशन के लिए भी आवेदन किया गया। संस्था को यह रजिस्ट्रेशन दे दिया गया है।
‘जाणता राजा’ महानाट्य का पांच दिवसीय आयोजन 20 से 25 अक्तूबर तक सीएसए परिसर में हुआ था। लाखों रुपये रोजाना टिकट बिक्री वाला आयोजन जीएसटी में रजिस्ट्रेशन कराए बिना और अनुमानित एडवांस टैक्स दिए बिना ही हो रहा था। न तो आयोजकों ने इसे गंभीरता से लिया और न ही स्टेट जीएसटी के अफसरों ने। अमर उजाला ने 22 व 23 अक्तूबर के अंक में इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया। अमर उजाला में खबर प्रकाशित होने के बाद आयोजन समिति ने 23 अक्तूबर को रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया था। 25 अक्तूबर को खंड-3 में इसका रजिस्ट्रेशन हो सका था। टिकटों पर जीएसटी नंबर तक दर्ज नहीं था।
इसलिए चर्चा में आया आयोजन
कमाया खूब पर टैक्स कम क्यों
जाणता राजा महानाट्य का मंचन देखने के लिए 6700 लोगों के एक साथ बैठने की व्यवस्था थी। इसमें टिकटों को चार कैटेगरी में बांटा गया था। 200, 500, 1000 और 5000 रुपये। 200 रुपये की टिकट वाली 4000 सीटें थीं। 500 रुपये की 1500 सीटें, 1000 रुपये की 1000 सीटें, 5000 रुपये वाली 200 सीटें थीं। आयोजन स्थल पांचों दिन ठसाठस भरा रहा था। इस तरह से प्रतिदिन कुल 35.50 लाख रुपये की टिकट बिक्री बनती है। कार्यक्रम स्थल पर 200 और 500 की 10 फीसदी सीटें खाली भी मान लें तो करीब 30 लाख रुपये की टिकट बिक्री प्रतिदिन हो रही थी, लेकिन आयोजन समिति की ओर से कर योग्य कमाई करीब 42 लाख रुपये ही दर्शायी गई। यानी स्टेट जीएसटी के अफसरों को अभी भी इसमें खेल नजर आ रहा है। माना जा रहा है कि इस प्रकरण को विशेष जांच के लिए रखा जा सकता है।
इस तरह किया जा रहा था खेल
आयोजन समिति के सदस्यों ने टैक्स बचाने के लिए 5000 रुपये वाली टिकट को डोनर कार्ड का नाम दे दिया था। 5000 रुपये के टिकट वाली 200 सीटे थीं। इन सीटों पर बैठने वालों को टिकट न देकर उनसे पास के तौर पर 5000 रुपये लिए गए थे। सिर्फ डोनर कार्ड के जरिये रोजाना 10 लाख रुपये समिति के पास आ रहे थे। दरअसल डोनर कार्ड पर टैक्स की देयता खत्म हो जाती है।
जाणता राजा के महंगे टिकट बिकवाने के लिए जिला प्रशासन की ओर से सरकारी कार्यालयों को टारगेट सौंपा गया था। सरकारी स्कूलों, बड़े प्रतिष्ठानों और कार्यालयों में टारगेट देकर टिकटों की बिक्री करवाई गई। बाद में यह पैसा आयोजन समिति को सौंपा गया। कई विभागों के मुखिया ने इसका विरोध भी किया था।