फेफड़ों की लाइलाज मानी जाने वाले बीमारी लंग्स फाइब्रोसिस, सीओपीडी के रोगियों को स्टेम सेल थेरेपी से नई जिंदगी मिलेगी। स्टेम सेल थेरेपी से फेफड़ों की स्थिति में सुधार आएगा। इसके साथ ही कोरोना से जिन लोगों के फेफड़े क्षतिग्रस्त हो गए हैं, उनमें भी सुधार आएगा। जीएसवीएम प्रदेश के राजकीय मेडिकल कालेजों में पहला कालेज है जो स्टेम सेल थेरेपी का हब बन रहा है।
आने वाले दिनों में गुर्दे और लिवर रोग में भी इसका इस्तेमाल किया जाएगा। प्रदूषण के कारण कानपुर में सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पलमोनरी डिजीज) के रोगियों की संख्या बहुत अधिक है। इसमें फेफड़ों में सिकुड़न आ जाती है। रोगी को पहले आक्सीजन फिर वेंटिलेटर की जरूरत पड़ती है और फिर मौत हो जाती है। कोविड होने के बाद बहुत से रोगियों की जान तो बच गई है। लेकिन वे अभी भी आक्सीजन पर हैं। आक्सीजन हटते ही स्थिति बिगड़ने लगती है। बहुत से रोगी इंटर स्टेशियल लंग्स डिजीज की गिरफ्त में है।
कोरोना के बाद सीओपीडी की स्टेज बढ़ गई। लंग्स फाइब्रोसिस की वजह से लोगों की सांस फूल रही है। स्टेम सेल थेरेपी विशेषज्ञ और जीएसवीएम मेडिकल कालेज के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. बीएस राजपूत ने बताया कि लंग्स फाइब्रोसिस में वह स्टेम सेल थेरेपी को आजमा चुके हैं। ऐसे रोगी जिन्हें फाइब्रोसिस के कारण दो-तीन हफ्ते का मेहमान माना जा रहा था, वह 10 साल से सामान्य जीवन जी रहे हैं।
इसी तरह सीओपीडी में स्टेम सेल टिश्यू जनरेशन में अच्छी भूमिका निभाती है। इसके साथ ही गुर्दे, लिवर की बीमारियों में इसका इस्तेमाल हो सकता है। कालेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने बताया कि हैलट स्टेम सेल थेरेपी का हब बनेगा। प्रदेश के किसी अन्य कालेज में इस थेरेपी का इतना इस्तेमाल अभी नहीं हो रहा है।