पुराणों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र एवं वृष राशिस्थ चन्द्रमाकालीन अर्धरात्रि को द्वापर युग में हुआ था। तब से इसी मुहूर्त में प्रति वर्ष भगवान कृष्ण की जन्माष्टमी मनाई जा रही है।
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जन्माष्टमी पर्व
पांच हजार से भी ज्यादा सालों से प्रति वर्ष सभी भक्त भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मानते है। इस वर्ष आस्था व श्रद्धा के उसी संस्कार का पालन करते हुए घरों में 2 व 3 सितम्बर को भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है।
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जन्माष्टमी पर्व
पिछले कई वर्षों की तुलना में इस वर्ष कन्हा के जन्म पर विशेष संयोग पड़ा है। जिसके चलते इस वर्ष विधि-विधान से किया गया पूजन कई गुना फलदायी हो गया है।
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जन्माष्टमी पर्व
पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने कृष्ण रूप में भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को धरती पर आठवां अवतार लिया था।
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कृष्ण जन्माष्टमी की तिथि और शुभ मुहूर्त
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जन्माष्टमी पर्व
ज्योतिषाचार्य डॉ. संजय श्रीवास्तव के अनुसार अष्टमी तिथि शुरू होकर और 3 सितंबर को अष्टमी तिथि 7 बजकर 19 मिनट पर समाप्त होगी। जबकि रोहिणी नक्षत्र का प्रारंभ 2 सितंबर को रात 8 बजकर 48 से हो चुका है और 3 सितंबर की रात 8 बजकर 08 मिनट पर रोहिणी नक्षत्र समाप्त होगा।
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क्यों मानते हैं कृष्ण जन्माष्टमी
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जन्माष्टमी पर्व
भगवान विष्णु ने कृष्ण रूप में भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को धरती पर आठवां अवतार लिया था। भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे इसलिए इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी और जन्माष्टमी के रूप में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।
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जन्माष्टमी पर्व
बता दें कि कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर होती है। पहले दिन वाली जन्माष्टमी मंदिरों और ग्रहस्तों के यहां मनाई जाती है और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी निंबार्क सम्प्रदाय के लोग मनाते हैं।
रविवार को आधी रात मंदिरों में श्री कृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। घंटे, घड़ियाल व शंख की ध्वनि से आधी रात मंदिर गूंज उठे। लोगों ने प्रभु को भोग लगाया व बधाई गीत गाए। इस अवसर पर मंदिरों का नजारा वृंदावन सा दिखाई दिया।