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विजय दिवस: भारत-पाक युद्ध में कानपुर के योद्धाओं ने दिया था अदम्य साहस का परिचय, बरसते गोलों के बीच आगे बढ़े, दुश्मनों से डटकर लड़े

Thu, 16 Dec 2021 12:18 PM IST
शिखा पांडेय अमित अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर

सार

पाकिस्तान पर हुई इस फतेह में कानपुर के भी योद्धाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया था। ये योद्धा आज भी उस दौर को याद कर जोश से ओतप्रोत हो जाते हैं। 
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महेंद्र पाल शर्मा, सूबेदार वाईके सिंह, देव नारायण दीक्षित - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सन 1971 में तेरह दिन तक चले युद्ध के बाद 16 दिसंबर को भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर जीत हासिल की थी। तब से इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। पाकिस्तान पर हुई इस फतेह में शहर के भी योद्धाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया था।
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ये योद्धा आज भी उस दौर को याद कर जोश से ओतप्रोत हो जाते हैं। इन्हीं में से एक हैं श्याम नगर निवासी देव नारायण दीक्षित। वायुसेना से वारंट अफसर पद से रिटायर्ड देव नारायण तब सार्जेंट थे। बताते हैं कि युद्ध के दौरान पालम से रात 12 बजे उन्हें युद्ध का व अन्य सामान लेकर अंबाला पठानकोट भेज दिया गया।

दुश्मन लगातार गोलियां बरसा रहे थे। रास्तों में बड़ा जोखिम था। इसके बाद भी उन्होंने और उनके साथियों ने हिम्मत नहीं हारी। नाले के सहारे आगे बढ़े और साथियों तक सामान पहुंचाया। देव नारायण 1962 और 1965 की लड़ाई में भी शामिल रहे। वे तीन जून 1955 को वायुसेना में शामिल हुए थे और 1985 में सेवानिवृत्त हुए। उनका नाती अनुकल्प दीक्षित भी एयरमैन पद पर चयनित हो चुका है। 
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50 किलोमीटर पैदल चले, बंकर खोदकर छिपे
श्यामनगर में रहने वाले सूबेदार वाईके सिंह 1969 में सिग्नल कोर में बतौर तकनीशियन भर्ती हुए थे। 1997 में सेवानिवृत्त हुए। भारत-पाक के बीच हुए युद्ध में वो 21 साल के थे। पश्चिमी सीमा पर शंकरगढ़ सेक्टर में बरसते गोलों के बीच रेडियो रिले संचार व्यवस्था स्थापित कर युद्ध में योगदान दिया। ट्रेन के पठानकोट तक ही जाने के कारण उन्हें और उनकी टीम को 50 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। दुश्मन के गोले लगातार जगह-जगह गिर रहे थे। रात होने पर बंकर खोदकर रुके और फिर आगे बढ़े। इस तरह उन्होंने अपना टास्क पूरा किया। उन्होंने ऑपरेशन पवन, ऑपरेशन ब्लू स्टार आदि युद्धों में भी हिस्सा लिया। उन्हें पश्चिमी युद्ध स्टार, ऑपरेशन पवन पदक, विदेश सेवा पदक समेत कुल 12 पदक  मिले हैं। 

टॉर्च की रोशनी में लादते थे जहाजों पर सामान
नेताजी नगर में रहने वाले और मास्टर वारंट अफसर पद से सेवानिवृत्त महेंद्र पाल शर्मा ने बताया कि युद्ध की घोषणा होने से पहले ही वायुसेना अलर्ट मोड पर थी। घोषणा होने के साथ ही साजो-सामान की आवाजाही शुरू हो गई। उस समय वो कानपुर में एयर डिस्पैच फ्लाइट के प्रभारी थे। युद्ध में हथियार, रसद पहुंचाने की जिम्मेदारी थी। ब्लैक आउट होने के कारण रात में टॉर्च की रोशनी में काम करते थे। 

ओएफसी की बनी तोप ने बरसाए थे गोले
जिस इंडियन फील्ड गन (आईएफजी) की फील्डगन फैक्टरी पूरी तरह से ओवरहॉलिंग करने में सक्षम हो गई है, वही तोप भारत-पाक के युद्घ के दौरान दुश्मन पर कहर बनकर टूटी थी। इस तोप की बैरल तब आयुध निर्माणी कानपुर में बनती थी। सेना इन तोपों के साथ ही टी-55 टैंक का इस्तेमाल करती थी। 19 किलोमीटर तक मार करने वाली इस तोप का सेना आज भी इस्तेमाल करती है।
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