कानपुर देहात। जिले के छह ब्लॉकों में मिट्टी की सेहत ज्यादा खराब है। जैविक कार्बन आधा फीसदी तो नाइट्रोजन एक चौथाई फीसदी से भी कम के स्तर पर पहुंच गई है। इस बात का खुलासा कृषि विभाग द्वारा जारी स्वास्थ्य कार्ड में हुआ है। गोबर और हरी खाद का प्रयोग करने के साथ फसल चक्र अपनाकर मिट्टी की सेहत सुधारी जा सकती है।
जनपद के 10 ब्लाॅकों में करीब तीन लाख किसान पंजीकृत हैं। कृषि विभाग की ओर से रबी व खरीफ सीजन में प्रति ब्लॉक 100 गांवों में दो- दो हजार मिट्टी के नमूने लिए गए थे। बारा स्थित कृषि विभाग की प्रयोगशाला में इन नमूनों की जांच कराई गई। इसके बाद विभाग ने मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किया। इसमें संदलपुर, सरवनखेड़ा, मलासा, राजपुर, झींझक व अकबरपुर में मिट्टी की सेहत अधिक खराब है। इन ब्लॉकों में लिए गए मिट्टी के नमूनों में जैविक कार्बन व नाइट्रोजन की कमी पाई गई है। जैविक कार्बन का मानक स्तर पांच फीसदी है। जांच में जैविक कार्बन 0.5 फीसदी के स्तर पर पाया गया है। वहीं नाइट्रोजन एक फीसदी मानक के सापेक्ष 0.25 फीसदी मिली है।
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स्वास्थ्य कार्ड के अनुसार प्रयोग करें उर्वरक
रबी व खरीफ सीजन में मिट्टी के लिए गए नमूनों की जांच में जैविक कार्बन व नाइट्रोजन का स्तर मानक से काफी कम मिला है। मिट्टी की सेहत खराब पाई गई है। इसके लिए किसानों को फसल चक्र अपनाने की जरूरत है। वहीं, जैविक कार्बन बढ़ाने के लिए हरी खाद, गोबर की खाद या फिर वर्मी कंपोस्ट आदि का प्रयोग बढ़ाने की सलाह दी गई है। इसके साथ ही फसलों में जरूरत के अनुसार रासायनिक उर्वरक प्रयोग की जरूरत है। इसके लिए लगातार जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। मिट्टी की जांच के आधार पर ही जरूरत के अनुसार यूरिया व डीएपी का प्रयोग करना चाहिए। - हरीशंकर भार्गव, उप निदेशक कृषि
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कमी वाले छह ब्लॉकों में नमूनों की स्थिति
ब्लॉक - जांचे गए नमूने - कम मिला (जैविक कार्बन)- कम मिला (नाइट्रोजन)
संदलपुर- 2000- 1923 - 2000
सरवनखेड़ा-2000-1911-1971
मलासा- 2000-1928-1984
राजपुर- 2000-1909-1997
झींझक-2000-1912-1993
अकबरपुर-2000-1922-1999
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जैविक कार्बन व नाइट्रोजन की कमी से फसल पर असर
नाइट्रोजन की कमी से पौधों का बढ़ना रुक जाता है। जड़े कमजोर व पत्ते पीले होने से वृद्धि रुक जाती है। इससे पैदावार में भारी कमी आती है। वहीं, जैविक कार्बन पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराता है। सूक्ष्मजीवों को पोषण देने के साथ मिट्टी को भुरभुरा बनाता है। इससे पौधों की जड़ों का समुचित विकास होता है और फसल उत्पादन बढ़ता है।
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हरी खाद का प्रयोग व फसल चक्र जरूरी
उपनिदेशक कृषि हरीशंकर भार्गव ने बताया कि गोबर की खाद, वर्मीकंपोस्ट और हरी खाद (ढेंचा, मूंग व लोबिया) अहम है। हरी खाद 40 -45 दिनों में खेत में पलट देनी चाहिए। इससे नाइट्रोजन 50-60 किग्रा/हेक्टेयर प्राप्त होता है। साथ ही मिट्टी में जैविक कार्बन भी बढ़ता है। जबकि फसल चक्र अपनाने से दो से तीन वर्ष में कार्बन स्तर 0.75 फीसदी से ऊपर ले जाया जा सकता है।
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फसल अवशेष जलाना भी बिगाड़ रहा मिट्टी की सेहत
धान व गेहूं की फसल काटने के बाद अवशेष जलाने पर पूरी तरह से रोक नहीं लग सका है। इससे मिट्टी में मौजूद लाभ दायक सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं। इससे मिट्टी की पोषक क्षमता कमजोर होती है। कृषि विज्ञान केंद्र के मृदा वैज्ञानिक डॉक्टर खलील खान ने बताया कि फसल अवशेष जलाने के बजाय डी कंपोजर प्रयोग कर खेत में सड़ा कर खाद बनाने की जरूरत है। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन का स्तर बढ़ता है। मिट्टी उपजाऊ होने से उत्पादन बढ़ता है।
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फसल चक्र से बनेगी सेहत
कृषि विज्ञान केंद्र के मृदा वैज्ञानिक डॉ. खलील खान ने बताया कि मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए रासायनिक उर्वरक का प्रयोग कम से कम करना चाहिए। मिट्टी की जांच के अनुसार ही उर्वरक व सूक्ष्म तत्वों का प्रयोग करने से लागत कम होती है। वहीं जरूरी पोषक तत्वों की भरपाई होने से उत्पादन सुधरता है। हरी खाद में ढेंचा का बीज कृषि विभाग की ओर से वितरित किया जा रहा है। प्रति हेक्टेयर में 40 किलोग्राम ढेंचा बीज बोना ठीक रहता है। बाद में इसे पलट कर मिट्टी में मिला देने से खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। गेहूं व धान वाले खेत में एक दो साल के अंतर पर दलहनी फसलें उगाने से जैविक कार्बन का स्तर सुधरता है।
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इन ब्लॉकों की मिट्टी में आयरन की कमी
प्रति दो हजार मिट्टी के नमूनों की जांच में संदलपुर ब्लॉक में 1303 नमूनों में आयरन की कमी पायी गई। मैथा ब्लॉक में 1211, झींझक ब्लॉक में 1004 और डेरापुर ब्लॉक में 1057 नमूनों में आयरन कम पाया गया। जबकि अमरौधा ब्लॉक में 1110 नमूनों में आयरन कम मिला। मिट्टी में 4.5 पीपीएम से 10 पीपीएम (पार्ट पर मिलियन) का मानक है। प्रयोगशाला जांच में आयरन 2.5-4.5 पीपीएम मिला है।