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अवसाद, तनाव की माकूल थेरेपी है संगीत

Thu, 29 Jun 2017 03:44 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
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सिंगर गीतांजलि रॉय
अब अध्यात्म की परिभाषा मंत्र और माला जपने से कुछ और अधिक विस्तृत हो गई है। जिंदगी की आपाधापी में अब सेवा और सत्संग के जरिये भी शांति की तलाश जारी है। जब सत्संग चल रहा होता है तो शांति का एहसास भी होता है। अवसाद, तनाव की माकूल थेरेपी है संगीत। यह बात सिंगर गीतांजलि रॉय ने कही। वह गुरुवार को एक निजी समारोह में भाग लेने के लिए कानपुर शहर आई हैं। वैसे तो इनके कई भजन प्रसिद्ध हैं लेकिन हरी सुंदर नंद मुकुंद, हरि नारायण हरि बोल... सर्वाधिक प्रसिद्ध है।   
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सिंगर गीतांजलि रॉय
पंडित जसराज के अग्रज पंडित प्रतापनारायण की शार्गिदगी कर चुकीं गीतांजलि संगीतकार सरदार मलिक से भी संगीत की बारीकियां सीख चुकी हैं। वे अपने आप को सौभाग्यशाली मानती हैं कि उन्हें श्रीश्री रविशंकर की भावधार से जुड़ने का अवसर मिला है। गजल की ओर भी उनका खास रुझान रहा है।
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सिंगर गीतांजलि रॉय
कानपुर के होटल लैंडमार्क में अमर उजाला से विशेष बातचीत में वह कहती हैं जब गजल से भक्ति संगीत की ओर आई तो लगा कि एक सीढ़ी नीचे आ गई हूं। लेकिन जब भक्ति का रंग मन और स्वर में समाने लगा तो लगा कि अब तो मेरी गायिकी का प्रमोशन हो गया है।

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सिंगर गीतांजलि रॉय
पूना निवासी गीतांजलि रॉय का मानना है कि संगीत में मौजूद रूहानियत जीवन के हर अवसाद, तनाव और तमस की माकूल थेरेपी है। जीवन में नकारात्मकता का अतिरेक इस लिए हुआ है कि हम संवेदनाओं को भूल कर हद से ज्यादा कामर्शियल हो चलेे हैं। सुकून और गहन ध्यान की अनंत तलाश है संगीत। 
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सिंगर गीतांजलि रॉय
कानपुर के बारे में उनका कहना है कि शहर तो कई बार आ चुकी हैं। तब आईआईटी अपने चाचा के पास आई थीं। अब पहली बार संगीत के लिए आई हूं। कानपुर की मिठाई अवश्य खाऊंगी। बहुत नाम सुन रखा है यहां के लड्डू और मिठाई का।
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