बताते हैं कि फांसी के बाद वह इमली का पेड़ फिर पनप नहीं सका, जिस पर आजादी के 52 योद्धा फांसी पर लटकाए गए थे। बाद में उसी स्थान पर इमली का नया पौधा रोपा गया। इस स्थान को लोग दूसरा जलियां वाला बाग कहते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि यहां भी अंगरेजों ने फांसी के नाम पर सामूहिक नरसंहार ही तो किया था।
जलियां वाला बाग की तरह इस स्थान को बड़ा स्मारक नहीं बनाया गया, वरना दुनिया इन महान बलिदानियों को भी जानती। देखरेख का जिम्मा वन विभाग का है। कोई बजट नहीं है। गेट से कोई भी बेरोकटोक अंदर आ जाता है। कई दावेदार हैं जो बताते हैं कि वे जोधा सिंह के वंशज हैं।
हम हैं वशंज
रसूलपुर गांव के राकेश सिंह का दावा है कि वह जोधा सिंह अटैया के वंशज हैं। वह छोटामोटा काम करके जीवन यापन कर रहे हैं। जोधा सिंह का पुश्तैनी घर न जाने कब गिर गया। अब वहां मैदान है जिस पर लोग गोबर और पुआल वगैरह डालते हैं। जोधा सिंह के नाम पर गांव में पार्क के लिए 10 बीघा जमीन दी गई थी पर वहां चाहरदीवारी तक नहीं हुई। जोधा सिंह के एक बेटी थी और उसने ही वंश को आगे बढ़ाया।
जानिए जोधा सिंह अटैया को...
जोधा सिंह अटैया ने 1857 में अपने क्रांतिकारी साथियों का दल बनाया। तात्या टोपे से गुरिल्ला वार की कला सीखी और अंगरेजों को छका दिया। अक्तूबर 1857 को महमूदपुर गांव में एक अंगरेज दारोगा और सिपाही को जिंदा जला दिया।
रानीपुर पुलिस चौकी पर हमला कर तबाही मचा दी। कर्नल पावेल को मौत के घाट उतार दिया। 9 दिसंबर 1857 को जहानाबाद तहसील को घेर कर खजाना लूट लिया। इसमें दो दर्जन पुलिस वाले मारे गए। तहसीलदार को अगवा कर फिरौती में सभी किसानों का लगान माफ करवा लिया।
अप्रैल 1858 को अंगरेज सेना ने जोधा सिंह और उनके साथियों को घेर लिया। वह 51 साथियों सहित बंदी बना लिए गए। 28 अप्रैल 1858 की शाम खजुहा में इमली के पेड़ से लटकाकर सभी को फांसी दे दी गई। खौफ इतना फैला कि दो महीने तक कोई शव उतारने ही नहीं आया। बाद में ठाकुर महाराज सिंह ने शव उतरवाए। शिवराजपुर गंगातट पर सभी का अंतिम संस्कार किया।
प्रस्तुति- शैलेश अवस्थी