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यूपी: दूसरा 'जलियां वाला बाग' है बावनी इमली, एक साथ 52 क्रांतिकारियों को दी गई थी फांसी

Tue, 14 Dec 2021 02:44 PM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, फतेहपुर

सार

जोधा सिंह अटैया ने 1857 में अपने क्रांतिकारी साथियों का दल बनाया। तात्या टोपे से गुरिल्ला वार की कला सीखी और अंगरेजों को छका दिया। अक्तूबर 1857 को महमूदपुर गांव में एक अंगरेज दारोगा और सिपाही को जिंदा जला दिया। रानीपुर पुलिस चौकी पर हमला कर तबाही मचा दी। कर्नल पावेल को मौत के घाट उतार दिया।
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बावनी इमली - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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फतेहपुर की बिंदकी तहसील से चार किलोमीटर मुगल रोड पर चलते हुए आपको वन विभाग खजुहा का दफ्तर दिखेगा। उसी परिसर में है बावनी इमली, जहां 28 अप्रैल 1858 को महान क्रांतिकारी जोधा सिंह अटैया और उनके 51 साथियों को इमली के पेड़ पर फांसी दे दी गई थी। इसे दूसरा जलियां वाला बाग भी कहते हैं। दूसरी तरफ जोधा सिंह अटैया के गांव रसूलपुर में उनकी जन्मस्थली तलाशना मुश्किल है।
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महान क्रांतिकारी जोधा सिंह अटैया का जन्म बिंदकी के गांव रसूलपुर (पंधारा) में हुआ था। अब उनकी जन्मस्थली गुम है। न तो वहां कोई स्मारक, न प्रतिमा, न कोई संकेतक और न ही उनके नाम पर वहां तक पहुंचाने वाली सड़क। निशान लगभग मिट चुका है।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंगरेजों की नाम के दम कर देने वाले जोधा सिंह का खजुहा में स्मारक बना है। यहां उनकी प्रतिमा के साथ शहीद स्तंभ भी है। इमली के पेड़ के नीचे 52 छोटे स्तंभ हैं, जो बताते हैं कि यहीं जोधा सिंह और उनके साथियों ने भारत मां की आजादी के लिए कुर्बानी दी थी।
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बताते हैं कि फांसी के बाद वह इमली का पेड़ फिर पनप नहीं सका, जिस पर आजादी के 52 योद्धा फांसी पर लटकाए गए थे। बाद में उसी स्थान पर इमली का नया पौधा रोपा गया। इस स्थान को लोग दूसरा जलियां वाला बाग कहते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि यहां भी अंगरेजों ने फांसी के नाम पर सामूहिक नरसंहार ही तो किया था।

जलियां वाला बाग की तरह इस स्थान को बड़ा स्मारक नहीं बनाया गया, वरना दुनिया इन महान बलिदानियों को भी जानती। देखरेख का जिम्मा वन विभाग का है। कोई बजट नहीं है। गेट से कोई भी बेरोकटोक अंदर आ जाता है। कई दावेदार हैं जो बताते हैं कि वे जोधा सिंह के वंशज हैं।

हम हैं वशंज
रसूलपुर गांव के राकेश सिंह का दावा है कि वह जोधा सिंह अटैया के वंशज हैं। वह छोटामोटा काम करके जीवन यापन कर रहे हैं। जोधा सिंह का पुश्तैनी घर न जाने कब गिर गया। अब वहां मैदान है जिस पर लोग गोबर और पुआल वगैरह डालते हैं। जोधा सिंह के नाम पर गांव में पार्क के लिए 10 बीघा जमीन दी गई थी पर वहां चाहरदीवारी तक नहीं हुई। जोधा सिंह के एक बेटी थी और उसने ही वंश को आगे बढ़ाया।

गांव में तो कुछ भी नहीं हुआ
जोधा सिंह अटैया ने क्रांतिकारियों का एक बड़ा दल बनाकर अंगरेजी हुकूमत से टक्कर ली और बलिदान हो गए। उनकी जन्मस्थली पर उनके नाम पर कुछ नहीं हुआ। न तो जगह सुरक्षित रखी गई और न ही कोई पहचान। मांग है कि यहां भी स्मारक बने। इसके लिए कोशिश करेंगे। - सुनील कुमार, ग्राम प्रधान रसूलपुर

पर्यटन स्थल घोषित, अब काम होगा...
खजुहा पर्यटन स्थल घोषित हो गया है। 50 लाख रुपये भी जारी हो गए हैं। बावनी इमली स्मारक के रखरखाव पर ध्यान दिया जा रहा है। अभी और सुंदर बनाया जाएगा। आसपास के मंदिरों को भी सुंदर बनाया जाएगा ताकि लोग वहां आएं। संकेतक भी लगाए जाएंगे। यहां तक आने वाली सड़कों का काम हाईवे और पीडब्लूडी को करना है।- जय कुमार जैकी, क्षेत्रीय विधायक एवं राज्यमंत्री
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जानिए जोधा सिंह अटैया को...
जोधा सिंह अटैया ने 1857 में अपने क्रांतिकारी साथियों का दल बनाया। तात्या टोपे से गुरिल्ला वार की कला सीखी और अंगरेजों को छका दिया। अक्तूबर 1857 को महमूदपुर गांव में एक अंगरेज दारोगा और सिपाही को जिंदा जला दिया।

रानीपुर पुलिस चौकी पर हमला कर तबाही मचा दी। कर्नल पावेल को मौत के घाट उतार दिया। 9 दिसंबर 1857 को जहानाबाद तहसील को घेर कर खजाना लूट लिया। इसमें दो दर्जन पुलिस वाले मारे गए। तहसीलदार को अगवा कर फिरौती में सभी किसानों का लगान माफ करवा लिया।

अप्रैल 1858 को अंगरेज सेना ने जोधा सिंह और उनके साथियों को घेर लिया। वह 51 साथियों सहित बंदी बना लिए गए। 28 अप्रैल 1858 की शाम खजुहा में इमली के पेड़ से लटकाकर सभी को फांसी दे दी गई। खौफ इतना फैला कि दो महीने तक कोई शव उतारने ही नहीं आया। बाद में ठाकुर महाराज सिंह ने शव उतरवाए। शिवराजपुर गंगातट पर सभी का अंतिम संस्कार किया।
                                                                                                                                                                                                                                                                   प्रस्तुति- शैलेश अवस्थी
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