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पितृपक्ष दो से, कोरोना काल में घर पर ही करें तर्पण, सर्व पितृ विसर्जन अमावस्या 17 सितंबर को

Mon, 31 Aug 2020 08:29 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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पितृपक्ष - फोटो : SOCIAL MEDIA
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इस बार पितृपक्ष दो सितंबर से शुरू होकर 17 सितंबर तक चलेंगे। 17 सितंबर को सर्वपितृ विसर्जन अमावस्या है। पितृपक्ष में जो लोग पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं वे लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा का सेवन न करें। साथ ही 15 दिनों तक दाढ़ी-बाल न बनवाएं।
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कोरोना महामारी के चलते गंगा तट पर न जाकर घर पर ही पितरों को जलदान करें। पंडित केए दुबे पद्मेश का कहना है कि भाद्रपद महीने की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक पितृपक्ष रहता है। इस बार पितृपक्ष दो सितंबर से 17 सितंबर तक हैं। ज्योतिष सेवा संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष आचार्य पवन तिवारी का कहना है कि पितृपक्ष में पितरों का तर्पण करना बहुत ही अच्छा होता है।

पितृ पक्ष में पितर देव स्वर्गलोक से धरती पर परिजनों से मिलने आते हैं। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है जिन प्राणियों की मृत्यु के बाद उनका विधिनुसार तर्पण नहीं किया जाता है उनकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है। पितृपक्ष में पितरों का तर्पण और श्राद्ध करने का विशेष महत्व होता है। जो भी अपने पितरों को तर्पण नहीं करता है उन्हें पितृदोष का सामना करना पड़ता है। ऐसे दोष की स्थिति में परिजनों को धन, सेहत और अन्य कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है।  
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श्राद्ध का विशेष महत्व होता
पितृपक्ष में श्राद्ध करने का विशेष महत्व होता है। हालांकि हर महीने की अमावस्या तिथि पर पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण किया जाता है। पितृपक्ष के 15 दिनों में श्राद्धकर्म, पिंडदान और तर्पण का अधिक महत्व मनाया गया है। इन 15 दिनों में पितर धरती पर किसी न किसी रूप में अपने परिजनों के बीच में रहने के लिए आते हैं। पितृपक्ष में श्राद्ध करने के कुछ खास तिथियां भी होती हैं। 

श्राद्ध से जुड़ी कुछ बातें
- जिन लोगों के सगे संबंधियों और परिवार के सदस्यों की मृत्यु जिस तिथि पर हुई है पितृपक्ष में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करना चाहिए। 
-  जिस महिला की मृत्यु पति के रहते ही हो गयी हो उनका श्राद्ध नवमी तिथि में किया जाता है। 
- ऐसी स्त्री जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है तो उनका श्राद्ध मातृ नवमी वाले दिन करना चाहिए। 
- आत्महत्या, विष और दुर्घटना आदि से मृत्यु होने पर मृत पितरों का श्राद्ध चतुर्दशी को किया जाता है।  
- पिता के लिये अष्टमी तो माता के लिये नवमी की तिथि श्राद्ध करने के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
- अगर किसी कारणवश अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि याद नही है तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करना उचित होता है।
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