प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मंगलवार को स्पष्ट किया है कि नॉन वोवेन पॉलिथीन पर भी प्रतिबंध लागू है। प्लास्टिक कैरीबैग की तरह ही इसका भी निर्माण, आयात, भंडारण, ढुलाई और विक्रय नहीं किया जा सकता।
पब्लिक और व्यापारियों में इस बात का भ्रम है कि नॉन वोवेन कैरीबैग पर प्रतिबंध लागू नहीं है। इस वजह से बाजार में बड़े पैमाने पर नॉन वोवेन कैरीबैग की बिक्री हो रही है।
कपड़े जैसा दिखने की वजह से कुछ निर्माताओं ने इसका उत्पादन शुरू कर दिया। पूर्व में शासनादेश में स्पष्ट न होने की वजह से बाजार में इस बात का प्रचार भी हो गया कि नॉन वोवेन कैरीबैग मिट्टी में मिलकर नष्ट हो जाता है।
बता दें कि गत 30 जनवरी को कानपुर प्लास्टिक एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कमिश्नर से मिलकर नॉन वोवेन कैरीबैग की बिक्री पर एतराज जताया था।
यह है श्ाासनादेश
किसी भी प्रकार की प्लास्टिक थैलियों का निर्माण, आयात, भंडारण, विक्रय और ढुलाई नहीं किया जाएगा। इसमें पॉली प्रॉपलीन और न बुने हुए फैब्रिक की थैलियां भी शामिल हैं। पुस्तक, पत्रिका व निमंत्रण पत्र में बांधने, ढकने के लिए प्लास्टिक शीट, प्लास्टिक फिल्म व प्लास्टिक ट्यूब का इस्तेमाल नहीं होगा।
इस पर लागू नहीं
यह आदेश जैव चिकित्सीय कूड़ा कर्कट प्रबंधन नियमावली के तहत मेडिकल पॉलिथीन पर लागू नहीं होगा। इसके अलावा ऐसे प्लास्टिक पर प्रतिबंध नहीं है जो पैकेजिंग का हिस्सा बनते हैं। इस्तेमाल से पूर्व सीलबंद होते हैं। जैसे दूध की थैली, बिस्कुट, चिप्स के पैकेट, पानी का पाउच आदि।
पॉलिथीन पर सुनवाई आज
पॉलिथीन पर प्रतिबंध के मामले में यूपी प्लास्टिक मैन्युफैक्चरर्स वेलफेयर एसोसिएशन की रिट पिटीशन पर तीन फरवरी को हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। एसोसिएशन अध्यक्ष हरीश इसरानी ने बताया सुनवाई में शामिल होने के लिए प्रतिनिधिमंडल के तौर पर प्लास्टिक उद्यमी अमित टुटेजा और अजय अरोड़ा हाईकोर्ट गए हैं।
बाजार में नई वैराइटी के कैनवास के झोले छाए
कानपुर। पॉलिथीन पर पाबंदी के बाद बाजारों में तरह तरह के झोलों की दुकानें सज गई हैं। नई वैराइटी कैनवास के झोले भी नजर आ रहे हैं। कॉटन कैनवास के ये झोले मजबूत हैं लेकिन अन्य झोलों की अपेक्षा महंगे हैं। ये दो किलो से लेकर 10 किलो के साइज में उपलब्ध हैं। इनकी कीमत 50 रुपये से 150 रुपये तक है।
इसी कपड़े से बनते हैं तिरपाल और जूते ः कॉटन कैनवास से तिरपाल और जूते भी बनते हैं। हालांकि तिरपाल और जूते में इस्तेमाल होने वाला कैनवास थोड़ा अलग होता है।
कैनवास के झोले बनाने वाले कारीगर नसीम खान बताते हैं कि मोटे कॉटन में मोम की लेप और केमिकल लगाकर इसमें रोलर से कोटिंग की जाती है। इस वजह से यह अन्य कपड़े से अधिक मजबूत होता है।
शुक्लागंज से आते हैं
वैसे तो कैनवास के झोले बनाने का काम शहर के चमनगंज, फेथफुलगंज इलाकों में कुटीर उद्योग की तरह होता है, लेकिन शुक्लागंज में यह बहुतायत में है। शुक्लागंज में सिलाई सस्ती होने की वजह से शहर के कारोबारी वहीं से झोले मंगाते हैं।
मेस्टन रोड स्थित कैनवास झोले के थोक व्यापारी नसीर अहमद बताते हैं कि पहले एक दिन में 10 से 20 झोले ही बिकते थे अब एक दुकान से 100 से 200 झोले तक बिक रहे हैं। कई व्यापारी इन्हीं झोलों में अपनी दुकान या फर्म का नाम लिखवाकर ग्राहकों को देते हैं।