फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सरकारों की अनदेखी और अफसरों की लूटखसोट का शिकार हुई एल्गिन मिल, नीलामी को तैयार

Sat, 24 Nov 2018 11:37 AM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

- सरकारों की अनदेखी और अफसरों की लूटखसोट का शिकार हो गई एल्गिन मिल 
विज्ञापन
एल्गिन मिल
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कानपुर को उत्तर भारत के मैनचेस्टर की पहचान दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाली एल्गिन मिल सरकारों की अनदेखी और अफसरों की लूटखसोट का शिकार हो गई। मिल बचाने और उसे चलाने की सारी उम्मीदें अब खत्म हो गई हैं। मिल अब खंडहर हो चुकी है। 40 लाख के कर्ज के कारण नीलामी के लिए उसे कब्जेदारों से मुक्त कराया जा रहा है। आप भी जानिए एल्गिन मिल का शहर में कैसा जलवा था। 
विज्ञापन


15 हजार मजदूर करते थे काम
1864 में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ के पिता एडवर्ड एल्गिन के नाम पर मिल की स्थापना की गई थी। यहां बनने वाली साठिया, चद्दर, तौलिया, बेड शीट, 660 नंबर चादर, जींस का कपड़ा, लंकलाट के बने कपड़ों की तूती देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी बोलती थी। उस दौर में यहां बने तौलिये और चादर को अंग्रेज लंदन लेकर जाते थे। 15 हजार से अधिक मजदूर काम करते थे। जब मिल में शिफ्ट बदली जाती थी तब मजदूरों का रेला निकलता था। ग्रीन पार्क छोर से लेकर नवाबगंज छोर की सड़कों पर दुकानें सज जाती थीं। धीरे धीरे मिल की हालत खस्ता होती गई। 

एल्गिन मिल
कर्ज से नहीं उबर पाई मिल
आजादी के बाद 11 जून 1981 को मिल का भारत सरकार ने अधिग्रहण कर लिया था। सरकार ने इसे बीआईसी की सहायक कंपनी के तौर पर स्थापित कर दिया। कुछ वर्षों तक उत्पादन के लिए सरकार कार्यशील पूंजी देती रही। इसके बाद चुनावी फायदा देख सरकार उत्पादन मद में सहायता न देकर केवल वेतन मद की ही धनराशि देती रही। वर्ष 1982 में उत्पादन चालू रखने के लिए तत्कालीन चेयरमैन ने मिल चलाने के लिए नौ बैंकों से करीब 40 लाख रुपये का लोन लिया। इस रकम से कुछ समय तो उत्पादन हुआ लेकिन बाजार और खरीदार न मिलने से उत्पादन घटता गया। मिल की अफसरशाही ने भी मिल को चलाने में कोई रुचि नहीं दिखाई। आखिरकार मिल बंद हो गई। अफसरों ने कर्ज चुकाने भी जहमत नहीं उठाई। धन का बंदरबांट हो गया। 

10 साल में सब खत्म 
1992 को मिल को बीमार घोषित कर दिया गया। 1994 से मिल बंदी की आधिकारिक घोषणा कर दी गई। 8 मई 2001 को अटल सरकार में मिल में कर्मचारियों ने वीआरएस लेकर इस शर्त को माना कि जब मिल चलेगी तो उन्हें रोजगार दिया जाएगा। इसके बाद न तो मिल चली न रोजगार मिला। मिल चलाने के लिए करीब 15 सालों से संघर्ष कर रहे मजदूर यहां अभी प्रतिदिन धरना देते हैं।  
विज्ञापन

एल्गिन मिल
मिल बंदी के ये भी कारण 
- मिल को कभी तकनीकी दक्ष प्रशासनिक अधिकारी चेयरमैन सरकार ने नहीं दिया।
- ऐसे चेयरमैन आए जिन्होंने बैंक से भारी भरकम लोन तो लिया लेकिन उसे चुका नहीं पाए। 
- अफसरशाही के कारण मिल के खर्च बढ़ते गए और उत्पादन कम होता गया। 
- मिल उत्पाद तो अच्छे बनाती रही लेकिन समय के साथ उत्पादों को बाजार नहीं मिले। 

घाटे के कारण आई नौबत
लगातार घाटे और कर्जे के चलते एल्गिन मिल और कानपुर टेक्सटाइल मिल लिक्विडेटर को सौंप दी गई थी। वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अवैध कब्जेदारों को हटाया गया था। ताकि नीलामी हो सके। कई लोग कुछ समय बाद फिर से काबिज हो गए थे। इसके बाद कानपुर टेक्सटाइल की ओर से ऑफीशियल लिक्विडेटर और एल्गिन मिल के लिक्विडेटर कोटक महिंद्रा बैंक ने कब्जे खाली कराने को याचिका डाली थी। 14 नवंबर को हाईकोर्ट ने दोनों मिल परिसरों की 14 संपत्तियों में काबिज अवैध कब्जेदारों को दो सप्ताह में हटाने आदेश दिया है। जिसके बाद से प्रशासनिक कार्रवाई की जा रही है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें