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जानें, हजारों सालों से जिंदा एक ‘इंसान’ और द्वापर युग के इस शिव मंदिर का रहस्य

Thu, 13 Apr 2017 12:50 PM IST
गौरव शुक्ल/राजेश सैनी, अमर उजाला, कानपुर
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खेरेश्वर धाम मंदिर कानपुर
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क्या कोई इंसान हजारों सालों तक जिंदा रह सकता है। सुनकर अचंभा तो हुआ ही होगा। कानपुर से 40 किलोमीटर दूर शिवराजपुर गांव के लोगों का दावा है कि वे 36 पीढ़ियों से एक ऐसे इंसान को देख रहे हैं जो आठ फुट लंबा है। नजदीक जाने पर ये इंसान तेज रौशनी के साथ कहीं ओझल हो जाता है। मान्यता है कि यह महामानव और कोई नहीं अश्वत्थामा है। शिवराजपुर गांव जहां गुरु द्रोणाचार्य और उनके पुत्र अश्वत्थामा का अस्तित्व आज भी कायम है। मंदिर के महंत, पुजारी और गांव वालों का ऐसा दावा है कि मंदिर में सबसे पहले हर रोज खुद अश्वत्थामा सबसे पहले महादेव को जल चढ़ाने आता है, कई लोगों ने तो उसे अपनी आंखों से देखा है, देर रात अचानक तेज रौशनी प्रकट होना, जोर-जोर से घंटे बजना, खड़ाऊं की आवाजें आना आसपास रहने वाले लोगों के लिए तो आम बात सी है।
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अश्वत्थामा के जिंदा होने का सबूत देता है ये शिव मंदिर

खेरेश्वर धाम मंदिर कानपुर
खेरेश्वर धाम की मान्यता
शिवराज के खेरेश्वर धाम की मान्यता है कि द्वापर युग में यह गांव पहले गुरु द्रोणाचार्य का आरायण वन हुआ करता था। यहीं पर द्रोणाचार्य ने पांडवों और कौरवों को शस्त्र विद्या सिखायी। मंदिर के महंत आकाश पुरी गोस्वामी कहते हैं कि वह 36 पीढ़ियों से खेरेश्वर महादेव की पूजा कर रहे हैं। मंदिर के पास द्रोणाचार्य की कुटिया बनी थी।  द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा भी यहीं रहा करते थे। महाभारत के युद्ध  के दौरान अश्वत्थामा ने पांडवों के पुत्रों की छल से हत्या कर दी जिसके बाद भीमसेन ने अश्वत्थामा के माथे में लगी मणि निकालकर उसे शक्तिहीन बना दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया वह धरती पर तब तक पीड़ावश जीवित रहेगा जब तक स्वयं महादेव उसे उसके पापों से मुक्ति न दिला दें। तभी से ये कहा जाता है कि महादेव से मुक्ति की प्रार्थना के लिए यहां अश्वत्थामा हर रोज सबसे पहले जल चढ़ाने आता है।
 

गंधर्व सरोवर जहां आज भी खिलते हैं सफेद कमल

गंधर्व सरोवर, कानपुर
मंदिर के पास में ही एक तालाब बना हुआ है। गांव वालों की ढेर सारे कमलों से भरे इस तालाब पर अटूट आस्था है। लोगों का मानना है कि यह द्वापर युग का वही गंधर्व सरोवर है जहां यक्ष ने युधिष्ठिर से सवाल पूछे थे। इस तालाब में केवल सफेद रंग के कमल के फूल ही खिलते हैं। लोग दूर-दूर से यहां आकर सफेद कमल पुष्प भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना के लिए ले जाते हैं।

औरंगजेब ने तलवारें मारकर खंडित कर दी थीं मूर्तियां

खेरेश्वर धाम मंदिर कानपुर
खेरेश्वर धाम से 200 मीटर की दूरी पर महाभारत कालीन दूधेश्वर मंदिर बना हुआ है। ऐसी आस्था है कि यहां भगवान शिव सफेद रंग के शिवलिंग के रूप में स्वयं प्रकट हुए थे। इस शिवलिंग की पूजा हजारों सालों पहले स्वयं गुरु द्रोणाचार्य ने शुरू की थी। दूधेश्वर मंदिर के पुजारी केशव प्रसाद शुक्ल ने बताया कि मुगलकालीन शासक औरंगजेब ने इस गांव के सभी मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था। यहां तक कि दूधेश्वर महादेव और खेरेश्वर महादेव के शिवलिंग को खंडित करने के लिए उस पर अपनी तलवार से कई वार किये, तलवार की वार के प्रमाण आज भी दोनों शिवलिंगों में देखे जा सकते हैं। 

अश्वत्थामा का मंदिर

खेरेश्वर धाम मंदिर कानपुर
खेरेश्वर धाम से करीब 100 मीटर की दूरी पर अश्वत्थामा का मंदिर भी बना है। गांव के लोग अश्वत्थामा को देव के रूप में पूजते हैं इसलिए उन्हें विशेष स्थान देने के लिये मंदिर में उनकी छोटी सी मूर्ति भी स्थापित की है। अश्वत्थामा की मूर्ति के पास एक शिवलिंग भी स्थापित किया गया है। मंदिर के आसपास रहने वाले पुजारी केशव प्रसाद शुक्ल, सरस्वती देवी और मधुबाला ने बताया कि उन्होंने कई बार सफेद लिबास में लंबे चौड़े इंसान को मंदिर आते-जाते देखा है। कुछ पूछने पर वह नहीं बोलता और तेज रोशनी के साथ गायब हो जाता है। भारतीय पौराणिक मान्यता अनुसार आठ चिरंजीवी- बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, मारकण्ये ऋषि, परषुराम, अश्वस्थामा हैं। इन सभी का सुबह-सुबह स्मरण करने से बीमारियां दूर होती हैं और मनुष्य सौ वर्षों तक जीता है। द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा से बहुत प्रेम करते थे। शस्त्रों से संबंधित गुप्त रहस्य अश्वत्थामा ने अपने पिता से ही सीखे थे। 
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भोलेनाथ ब्रह्मांड भ्रमण के दौरान यहां रुके

डेमो पिक
बिल्हौर क्षेत्र के गंगा नदी तट पर करीब चार हजार सालों से आदिकालीन आस्था के मुख्य केंद्र खेेरेश्वर महादेव मंदिर का शिवलिंग स्वयंभू है। मान्यता है कि इसी स्थान पर आदि गुरु द्रोणाचार्य ने महाभारत काल में कौरवों और पांडवों को शस्त्र शिक्षा दी थी। गुरु द्रोणाचार्य की कुटी के कई अवशेष अब भी दंडी आश्रम पर खुदाई के दौरान मिलते हैं। अति प्राचीन खेरेश्वर महादेव मंदिर, गंगा घाट और दंडी आश्रम पर शासन-प्रशासन और भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा ध्यान नहीं देने से दिनोंदिन ये धरोहरें नष्ट होती जा रही हैं। खेरेश्वर महादेव मंदिर के महंत सुरेंद्र पुरी ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ ब्रह्मांड भ्रमण के दौरान कुछ समय के लिए यहां रुके थे तभी यहां ईश्वरी कृपा से अनंतकाल में स्यंभू शिवलिंग की उत्पति हुई थी। स्थान के महत्व को देखते हुए महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य ने गंगा नदी के तट पर अपनी कुटिया बनाई और अपने शिष्यों कौरवों और पांडवो को शस्त्र शिक्षा दी। यहीं पर द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का भी जन्म हुआ। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के श्राप के कारण अश्वत्थामा आज भी रोजाना ब्रह्म मुहूर्त में खेरेश्वर महादेव का गंगा जल से अभिषेक करने आते हैं जिसके साक्ष्य भक्तों को स्पष्ट दिखाई देते हैं। पुजारी कमलेश पुरी ने बताया कि खेरेश्वर मंदिर निहंगी गद्दी का है, कुछ दशक पहले नागा शिव भक्त यहां आया करते थे, लेकिन संसाधनों के अभाव में अब वह नहीं आते। 
शासन-प्रशासन ध्यान दे तो खेरेश्वर को मिले मान
धार्मिक स्थल के रूप में आसपास क्षेत्र में ख्याति पाने वाले खेरेश्वर मंदिर, खेरेश्वर गंगा घाट और दंडी आश्रम सहित देश-दुनिया का एक मात्र अश्वत्थामा मंदिर दुर्दशा का शिकार हैं। अराजक तत्व पुरातात्विक धरोहरों को क्षति पहुंचा रहे हैं और देखरेख के अभाव में कई शिलालेख, भवन, कुएं, पात्र व अन्य पुरातात्विक धरोहर नष्ट हो रही हैं। राजकीय संग्रहालय और भारतीय पुरातत्व विभाग का ध्यान भी अभी तक इस धार्मिकस्थली की ओर नहीं गया है। राजा सती प्रसाद के द्वारा भगवान शिव के लिए बनाया गया हाथी द्वार भी मरम्मत के अभाव में दिनों-दिन जमींदोज हो रहा है।
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