यह प्रयोग सफल होने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर इस शोध कार्य को प्रस्तुत किया गया है। इस विधि के लागू होने से सरकारों के बच्चे को मां के दूध पिलाने संबंध में अभियानों को और बल मिलेगा। डाक्टरों का कहना है कि इस वक्त सबसे बड़ी समस्या माताओं के दूध न उतरने की है। खासतौर पर युवतियों के पहली बार मां बनने पर यह दिक्कत अधिक आती है। इससे ऊपरी दूध का चलन बढ़ रहा है। ऊपरी दूध से बच्चों की सेहत दुरुस्त नहीं रहती है। ये बच्चे डायरिया, कुपोषण और एनीमिया का अधिक शिकार होते हैं।
यह है विधि
जैसे ही बच्चा पैदा होता है, उसे तुरंत मां का दूध पिलाया जाता है। इससे प्रोलैक्टिन हारमोंस का रिसाव होने लगता है और इसकी साइकिल बन जाती है। फिर मां के स्तन से दूध के रिसाव की प्रक्रिया जारी रहती है। इस हारमोन की साइकिल बिगड़ने पर मां का दूध उतरने में दिक्कत आती है। कुछ दिन अधिक गुजरने पर यह साइकिल ठप हो जाती है, इसके साथ तुरंत बच्चे को दूध पिलाने पर उसके शरीर के अवयव सक्रिय हो जाते हैं। मां का पहला दूध नवजात के लिए अधिक लाभप्रद है। इससे प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।
ऊपरी दूध
ऊपरी दूध से बच्चे का पेट तो भर जाता है, लेकिन उसे उतने मिनरल्स, प्रोटीन आदि नहीं मिलते जो मां के दूध से मिलते हैं। ऊपरी दूध पीने वाले बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता भी ढंग से विकसित नहीं होती। शोधों के निष्कर्ष के मुताबिक मां का दूध पीने वाले बच्चों की तुलना में ऊपर का दूध पीने वाले बच्चे अधिक बीमार पड़ते हैं।
प्रसूताओं में दूध न उतरने की आम समस्या है। नई विधि सफल है। डेढ़ महीने में पांच सौ से अधिक प्रसूताओं पर इसे आजमाया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर भी इसे प्रस्तुत किया गया है। इस संबंध में दूसरी बैठक होने वाली है। प्रोलैक्टिन हारमोंस के रिसाव की स्थिति सुधरती है। जच्चा और बच्चा दोनों को फायदा होता है।
- डॉ. किरन पांडेय, विभागाध्यक्ष स्त्री रोग विभाग