कानपुर। शहर में बड़े उद्योग पहले से ही बंद हो गए हैं। संंगठित श्रमिक खत्म हो रहे हैं जबकि असंगठित श्रमिक बढ़ते जा रहे हैं। उप्र भवन एवं सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड के तहत शहर में 6,87,543 श्रमिक पंजीकृत है। ई-श्रम में 1,54,280 श्रमिकों का पंजीकरण है। मिलों वाले शहर कानपुर में श्रमिक संगठनों की आवाज भी थम रही है। केंद्र सरकार ने पुराने 29 श्रम कानून को खत्म करके चार श्रम संहिताओं को लागू करने का फैसला किया है। प्रदेश में भी यह कानून जल्द लागू हो सकता है। इसके लिए उद्योग संगठनों से सुझाव भी मांगे गए हैं। इन चार श्रम संहिताओं को लेकर उद्योग संगठन खुश है। वहीं, श्रमिक संगठन ने इसे अधिकार छीनने वाला बताया है।
जानकारों ने बताया कि केंद्र सरकार ने श्रम सुधार के नाम पर पुराने कानूनों को मिलाकर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देने वाली चार श्रम संहिताओं को लागू किया है। नई संहिताओं के लागू होने से एक बुनियादी परिवर्तन यह हुआ है कि बड़ी संख्या में श्रमिकों को कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया है। औद्योगिक संबंध संहिता के तहत 300 तक कर्मचारियों वाली कंपनियों को सरकारी अनुमति के बिना कर्मचारियों को निकालने या छंटनी या ले ऑफ करने की अनुमति है जो पहले 100 कर्मचारियों तक सीमित था। हड़ताल करने से पहले 60 दिन का नोटिस देना अनिवार्य कर दिया गया है।
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मिलें हो गईं बंद
शहर के औद्योगिक स्वरूप को वापस लाने के लिए सरकारें और जनप्रतिनिधि जुबानी घोड़े दौड़ा रहे हैं लेकिन शहर से बड़े उद्योग खत्म होते जा रहे हैं। 1500 करोड़ रुपये से 14 साल पहले पुनर्जीवित की गई कानपुर फर्टिलाइजर एंड केमिकल्स लिमिटेड (केएफसीएल) को प्रबंधन ने पिछले साल बंद कर दिया था। ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन (बीआईसी) और नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन (एनटीसी) के अधीन लाल इमली, म्योर मिल, एल्गिन मिल एक और दो, कानपुर टेक्सटाइल, लक्ष्मी रतन कॉटन मिल, अथर्टन मिल, विक्टोरिया मिल, स्वदेशी कॉटन मिल बंद हो चुकी हैं। लाल इमली बंदी के कगार पर है।
श्रमिकों का दबदबा भी होता गया कम
संगठित क्षेत्र के उद्योगों, सूती और ऊनी कपड़ों की मिलों के साथ ही सेना को जूते की आपूर्ति करने वाली फैक्टरी टेफ्को सरकारी नीतियों के चलते बंद हो जाने के बाद श्रमिक यूनियनों पर भी असर पड़ा। कानपुर में इंटक, एटक, हिंद मज़दूर सभा, सीटू, टीयूसीसी से संबद्ध यूनियनें सक्रिय रहीं। कुछ समय बाद ऐक्टू, एआईयूटीयूसी श्रम महासंघों ने प्रभाव बनाने की कोशिश की लेकिन मजदूरों के बीच छाप नहीं छोड़ सकींं। श्रमिक संगठनों (ट्रेड यूनियनों) के कमजोर होने के पीछे कई आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक कारण जिम्मेदार हैं।
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शहर में मैन्यूफैक्चरिंग घट रही
उद्यम पंजीकरण के आंकड़ों के अनुसार, शहर में उत्पादन क्षेत्र में लगातार दूसरे साल भी कमी दर्ज हुई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में 9619 उद्यम ही मैन्यूफैक्चरिंग के लिए पंजीकृत हुए। ट्रेडिंग में 16559 और सर्विस क्षेत्र में 9439 उद्यम पंजीकरण हुए। कुल 35627 पंजीकरण हुए हैं।
बातचीत
नियोक्ता और कर्मचारी का हित बराबर रहे
चार नई श्रम संहिता से उद्योगों का अनुपालन घटेगा। कानूनी अड़चनों से दूर होकर उद्योग बढ़ाने पर आगे बढ़ सकेंगे। प्रदेश सरकार ने सुझाव मांगे थे जो भेज दिए गए हैं। संगठन का मानना है नियोक्ता और कर्मचारी का हित बराबर रहे। - आलोक अग्रवाल, राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्ष, आईआईए।
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मजदूरों की स्थिति बहुत खराब
मजदूरों की स्थिति बहुत खराब है। 14 घंटे का काम और 6 घंटे का दाम दिया जा रहा है। नोएडा में हुए श्रमिक आंदोलनों ने दिखाया कि श्रमिकों के साथ क्या हो रहा है। श्रमिक क्रांति की फिर आवश्यकता हो गई है। - राजेश कुमार शुक्ला, महामंत्री, ईपीएफ स्टाफ पेंशनर्स एसोसिएशन उप्र।
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श्रमिकों के अधिकार खत्म
नई श्रम संहिता के जरिए श्रमिकों के अधिकारों को खत्म कर दिया है। एक समय शहर की सरकारी और निजी क्षेत्र की 25 मिलों में ही पांच लाख से ज्यादा श्रमिक काम करते थे। अब शहर में निर्माण और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की संख्या बढ़ती जा रही है। - असित सिंह, अध्यक्ष, एटक।