वहीं, जिस दिन से प्रदेश में अतीक और उसके भाई की हत्या हुई है, तभी से मुख्तार के दिल में कानून और मौत का खौफ और पैदा हो गया था। यही वे हालात थे कि जेल में उसका एक-एक दिन एक-एक साल के बराबर बीत रहा था। आखिर में वह घड़ी भी आ गई, जब खौफ ही उसके लिए मौत बन गया और उसकी धड़कनों ने उसका साथ छोड़ दिया।