कानपुर। स्कूल दो शिफ्टों में कर दिए गए हैं। छोटे बच्चों को जल्दी बुलाया जाता है, इस कारण उनकी नींद पूरी नहीं होती। न वे नहा पाते हैं और न ही सही से नाश्ता कर पाते हैं। दोपहर में छुट्टी के बाद वे मोबाइल पर लग जाते हैं। रात में देर तक होमवर्क करना पड़ता है। सोते-सोते 12 बज जाता है। अगले दिन फिर साढ़े छह बजे स्कूल निकलना पड़ता है। आठ घंटे की नींद पूरी न होने से बच्चों में बीपी, शुगर जैसी समस्याएं कम उम्र में हो रही हैं जो आगे आने वाली पीढ़ी के लिए खतरनाक है। यह बात शोध में भी साबित हो चुकी है।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में फिजियोलॉजी विभाग की ओर से यूपी एसोपीकॉन में आए वक्ताओं ने ये बातें कहीं। कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि सीएसजेएमयू के कुलपति प्रोफेसर डॉ. विनय कुमार पाठक, मेडिकल कॉलेज की उप प्राचार्य डॉ. रिचा गिरि, आयोजन समिति की अध्यक्ष डॉ. डॉली रस्तोगी, सह अध्यक्ष डॉ. मुनिश रस्तोगी ने की। केजीएमयू के डॉ. यूएस पांडे और राम मनोहर लोहिया के डॉ. शिवम वर्मा ने कहा कि छोटे बच्चों के स्कूल का समय बदला जाए। इससे उनकी रिदम में कुछ सुधार होगा और अभिभावकों को भी चाहिए कि वे बच्चों को रात 10 बजे तक हर स्थिति में सुला दें और आठ घंटे की नींद पूरी होने के बाद ही उन्हें जगाएं।
भोपाल एम्स से आई डॉ. रुचि सिंह ने अपना शोध पत्र भी प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि सुबह बहुत जल्दी उठने और रात देर में सोने का असर बच्चों की नींद पर पड़ रहा है और कम उम्र में उनके साथ बीमारियां भी विकसित हो रही हैं। वक्ताओं ने कहा कि इस मामले में शासन को भी सुझाव दिया गया है कि स्कूलों का समय में परिवर्तन किया जाए। बड़े बच्चों को पहले और छोटे बच्चों को बाद में स्कूल बुलाया जाए। इस मौके पर प्रतिभागियों ने चिकित्सा अनुसंधान (मेडिकल रिसर्च) के विविध क्षेत्रों में किए गए अपने शोध कार्यों को पोस्टर के माध्यम से प्रस्तुत किया। केजीएमयू के प्रोफेसर डॉ. यूएस पांडे को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया गया।