26 जुलाई 1999 यह सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि भारतीय सेना के अदम्य साहस, समर्पण और भारत माता के जयकारों की गूंज है। कारगिल की बर्फीली और ऊंची चोटियों पर जब पाकिस्तानी घुसपैठियों ने नापाक कदम रखे तो जांबाजों ने अपनी जान की बाजी लगाकर दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। जांबाज योद्धाओं ने कारगिल युद्ध की कहानी बयां की।
इस दौरान आर्टिलरी में तैनात रहे अविनाश अग्निहोत्री बताते हैं कि युद्ध बेहद ऊंचे और दुर्गम पर्वतों पर लड़ा जा रहा था, जहां दुश्मन ऊपर बैठकर गोलीबारी कर रहा था। ऐसे में बोफोर्स और 105 एमएम फील्ड गन पाकिस्तानी सेना के लिए साक्षात काल बनकर टूटीं। इन तोपों ने ऐसी बमबारी की कि दुश्मन को संभलने का एक मौका तक नहीं मिला। यह तोपें पूरे युद्ध की सबसे बड़ी ताकत साबित हुईं।
वो दृश्य शब्दों में बयान नहीं कर सकते
गुरेज सेक्टर के कंजालवन इलाके में 23 आरआर में तैनात रहे अनिल चतुर्वेदी उस दौर को याद करते हुए कहते हैं कि शुरुआत में किसी ने नहीं सोचा था कि यह इतना बड़ा और लंबा संघर्ष बन जाएगा। वहां न रहने की जगह थी और न सुरक्षा। दिन में भारी मोर्टार और तोपों की शेलिंग होती थी, जिससे काम ठप हो जाता था। जवानों ने हार नहीं मानी और पूरी-पूरी रात जागकर मेहनत की और खुद बंकर तैयार किए। इस दौरान नौ जाट रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर पर सीधा मोर्टार शेल आ गिरा और वे वहीं शहीद हो गए। कई साथी आंखों के सामने देश पर कुर्बान हो गए थे। अनिल बताते हैं कि वह दृश्य शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता लेकिन जब 26 जुलाई को कारगिल पर तिरंगा लहराया, तब कलेजा ठंडा हुआ था।
अंधेरे में करनी पड़ी थी युद्ध की तैयारी
वायुसेना में मिराज-2000 लड़ाकू विमानों की तकनीकी देखरेख करने वाली टीम के टेक्निकल सुपरवाइजर रहे सलिल सक्सेना जिन्हें पांच मेडल से नवाजा जा चुका है। उन्होंने युद्ध के दौरान एयरबेस का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि युद्ध क्षेत्र में महज टॉर्च की हल्की रोशनी में अंधेरे के बीच लड़ाकू विमानों के कलपुर्जे बदलने और टेस्टिंग का काम चलता था। एक घटना को याद करते हुए वे बताते हैं कि एक बार फाइटर पायलट की रिवॉल्वर की एक बुलेट कॉकपिट के अंदर गिर गई। प्लेन के अंदर बुलेट का छूटना बहुत बड़ा खतरा बन सकता था। पूरी टीम ने कई घंटों तक लगातार मेहनत करके वह बुलेट ढूंढी और उसके बाद ही विमान को लेजर गाइडेड बम गिराने के लिए टेक-ऑफ की हरी झंडी दी गई।