कानपुर के चमड़ा उद्यमियों व टेनरी संचालकों के सामने श्रमिकों का संकट गहरा गया है। अनुमति मिलने के बाद भी टेनरियां नहीं चल पा रही हैं। इससे कच्चे माल का उत्पादन पूरी तरह ठप है। माल न मिलने से चमड़ा उत्पाद बनाने वाली निर्यातक इकाइयां बचा खुचा आर्डर पूरा करने की भी स्थिति में नहीं हैं।
कारोबारियों का कहना है कि श्रमिकों का इंतजाम न हुआ तो चमड़ा उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित होगा। हाल ही में जाजमऊ की 134 टेनरियों और निर्यातक इकाइयों को उत्पादन करने की अनुमति मिली है। चमड़ा उद्यमी उत्पादन करने की सोच भी नहीं पा रहे हैं, क्योंकि 70 फीसदी से ज्यादा श्रमिक पलायन कर चुके हैं।
कारोबारी बताते हैं कि टेनरियों में काम करने वाले ज्यादातर श्रमिक बिहार, बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के होते हैं। कानपुर और उसके आसपास के जिलों यानी स्थानीय श्रमिकों की संख्या 30 फीसदी से ज्यादा नहीं है। इतनी संख्या में उत्पादन करना संभव नहीं है, क्योंकि उत्पादन के दौरान अलग-अलग तरह के काम के लिए अलग-अलग हुनर और कौशल वाले श्रमिकों की जरूरत होती है। जितने श्रमिक बचे हैं उनसे हर तरह का काम नहीं लिया जा सकता है।