मुस्लिम बहुल इलाकों में बेची गई हिंदुओं की पुरानी चौखटें हैं। सांप्रदायिक दंगों के बाद हिंदू-मुस्लिम अलग-अलग मुहल्लों में रहने लगे। समूह में रहने की सुरक्षात्मक सोच से पुरखों की देहरियां छूट गईं लेकिन उन चौखटों पर दीये जलें, इसका ख्याल मुस्लिम समाज के लोग आज भी रखते हैं।
दिवाली पर मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदुओं के पुरखों की चौखट पर दीये जलेंगे। मुस्लिम समाज के लोग भी इसमें शामिल होंगे। पिछले साल कोरोना की वजह से रस्म अदायगी हुई थी। इस बार इसे जोश-ओ-खरोश से मनाया जाएगा।
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मुस्लिम बहुल इलाकों में बेची गई हिंदुओं की पुरानी चौखटें हैं। सांप्रदायिक दंगों के बाद हिंदू-मुस्लिम अलग-अलग मुहल्लों में रहने लगे। समूह में रहने की सुरक्षात्मक सोच से पुरखों की देहरियां छूट गईं लेकिन उन चौखटों पर दीये जलें, इसका ख्याल मुस्लिम समाज के लोग आज भी रखते हैं।
तहारत मंच के संयोजक मुस्तफा तारिक ने बताया कि दादामियां चौराहे पर बाबू मुंशीराम की चौखट पर सौहार्द्र के दीप जलेंगे। यहां मुंशीराम 2003 तक रहते थे। उसके बाद उनका निधन हो गया। उनके पुत्र वेद भाटिया और विजय भाटिया पंजाब के जालंधर और अब इंग्लैंड में रहने लगे हैं।
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वे लोग दिवाली में कानपुर आते हैं। अगर नहीं आ पाते हैं तो उनकी रजामंदी से मुस्लिम समाज के लोग उनकी चौखट पर दीये जलाते हैं। मुंशीराम इकलौते हिंदू चमड़ा कारोबारी थे, जो मुस्लिम एसोसिएशन के सदस्य रहे। इसी तरह इसी चौराहे पर राम बालक अत्तार की आयुर्वेदिक-यूनानी दवाओं की दुकान है।
यहां पर उनके पुत्र पम्मी गुप्ता और अशोक गुप्ता भी मुस्लिम समाज के लोगों के साथ दीप जलाते हैं। होलिका दहन हो या दिवाली के दीयों से रोशनी करना, इन कामों में यहां के शाहिद अजीज, अब्दुल हई, जाकिर हुसैन, हबीब अख्तर वसफी, आसिफ खान, मोहम्मद अली, इरफान अंसारी का सहयोग रहता है।