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तांबे की देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित है
बुधवार को ही मंदिर में स्थापना और पूजन कराया गया। इसी कारण माता का नाम बुद्धा देवी पड़ा। मंदिर में पांच पिंडियों के पीछे दीवार पर तांबे की देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित है। माता के पास ही एक ईंट रखी है। श्रद्धालु ईंट के नीचे एक रुपया और मन्नत की पर्ची रखते हैं। मान्यता है कि इससे मनोकामना पूरी होती है। लोग बताते है कि बुद्धू माली पहले खेत में उगी हरी सब्जियां माता को अर्पित करते थे, फिर घर भेजते थे।
आज भी मंदिर की सेवा में जुटी है चौथी पीढ़ी
यही परंपरा आज भी जारी है। मंदिर में मुंडन और विवाह जैसे शुभ कार्यों से पहले दर्शन की विशेष मान्यता है। दूल्हा बरात लेकर निकलने से पहले माता के दरबार में माथा टेकता है, जबकि विवाह के बाद दुल्हन भी घर जाने से पहले दर्शन करती है। प्रत्येक बुधवार को माता का भव्य शृंगार किया जाता है। बुद्धू माली के कुशवाहा परिवार की तीसरी और चौथी पीढ़ी आज भी मंदिर की सेवा में जुटी है। परिवार के आठ सदस्य बारी-बारी से 15 दिन की जिम्मेदारी निभाते हैं।
तीसरी पीढ़ी के हाथ में मंदिर की जिम्मेदारी
मंदिर के प्रबंधक विनीत अग्रवाल ने बताया कि उनके बाबा ने 1936 में बुद्धा देवी महारानी ट्रस्ट कमेटी बनाई थी। उनके पिता बृजेंद्र कुमार अग्रवाल इसकी देखरेख करते थे। वर्ष 2019 में पिता के निधन के बाद वह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। मंदिर परिसर में बने मकानों के किराये से रखरखाव किया जाता है, जबकि चढ़ावा माली परिवार को मिलता है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1974 से उन्होंने मंदिर से जुड़ी मान्यताओं और परंपराओं को करीब से देखा है।