Kannauj News: सौरिख-छिबरामऊ मार्ग बारिश के बीच सड़क किनारे तौलिए में एक नवजात बच्ची लिपटी मिली है। रोने की आवाज सुनकर राहगीरों ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए बच्ची को प्राथमिक सुरक्षा के लिए छिबरामऊ के एक निसंतान दंपती को सौंप दिया है।
एक तरफ देश बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारों से गूंज रहा है, तो दूसरी तरफ समाज के कुछ रूढ़िवादी सोच वाले लोग आज भी बेटियों को बोझ मानकर सरेराह छोड़ जाने से बाज नहीं आ रहे। ममता को तार-तार करने वाला ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला मामला सौरिख-छिबरामऊ मार्ग से सामने आया है। यहां सड़क किनारे तौलिए में लिपटी एक जीवित नवजात बच्ची लावारिस हालत में मिली।
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मासूम की किलकारी सुन ठिठके राहगीरों के कदम
सौरिख-छिबरामऊ रोड से गुजर रहे राहगीरों की नजर जब सड़क किनारे कपड़े की एक पोटली पर पड़ी, तो पहले तो उन्हें किसी अनहोनी की शंका हुई। पास जाकर देखा तो तौलिए में लिपटी एक नवजात बच्ची जिंदगी और मौत से जंग लड़ती हुई रो रही थी। मासूम को उस बेबस हालत में देखकर राहगीरों का कलेजा मुंह को आ गया। स्थानीय लोगों ने तुरंत संवेदनशीलता दिखाते हुए पुलिस को मामले की जानकारी दी।
निसंतान दंपती के चेहरों पर आई खुशी, लेकिन...
सूचना पर पहुंची पुलिस ने बच्ची को तुरंत अपनी कस्टडी में लिया। ममता से महरूम उस मासूम को प्राथमिक सुरक्षा देने के उद्देश्य से पुलिस ने छिबरामऊ के एक निसंतान दंपती को सौंप दिया, जिनके घर मासूम की आमद से खुशियों की रोशनी फैल गई।
बाल कल्याण समिति के संरक्षण में जाएगी मासूम
हालांकि, विधिक और कानूनी पहलुओं को लेकर चाइल्ड लाइन प्रभारी तौसीफ वारसी ने स्पष्ट किया कि कानूनी प्रक्रिया के तहत किसी भी लावारिस मिले बच्चे को बिना बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) की अनुमति के सीधे गोद नहीं दिया जा सकता। उन्होंने बताया कि बच्ची की सुरक्षा और भविष्य को ध्यान में रखते हुए उसे जल्द ही बाल कल्याण समिति के संरक्षण में सौंपा जाएगा, ताकि नियमानुसार उसकी देखरेख और गोद लेने की प्रक्रिया पूरी की जा सके।
सवाल छोड़ गई निष्पाप मुस्कान
सड़क किनारे तड़पती मिली इस मासूम बच्ची का कसूर सिर्फ इतना था कि वह एक बेटी के रूप में इस दुनिया में आई। जिस उम्र में मां का आंचल और पिता की गोद उसकी दुनिया होनी चाहिए थी। उस उम्र में उसे लावारिसों की तरह सड़क पर फेंक दिया गया। यह घटना पूरे समाज के सामने एक गंभीर और कड़वा सवाल छोड़ती है कि आखिर कब तक बेटियों को अपनी सांसों के लिए ऐसे संघर्ष करना पड़ेगा?