खुशबू का शहर कन्नौज सियासतदानों का कड़ा इम्तिहान लेने में जरा भी मरव्वत नहीं करता है। यहां के सियासी समर में एक अदद जीत हासिल करने से पहले सियासतदानों को कड़ी मशक्कत से होकर गुजरना पड़ा है। फिर चाहे यहां पहला चुनाव जीतने वाले डॉ. राम मनोहर लोहिया हों, या मौजूदा सांसद सुब्रत पाठक। इन सभी को यहां अपनी पहली जीत हासिल करने से पहले शिकस्त का सामना करना पड़ा है।
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कन्नौज संसदीय क्षेत्र में लोकसभा के अब तक 16 चुनाव हो चुके हैं। इसमें चंद ही चेहरे ऐसे हैं, जिन्हें शिकस्त का सामना नहीं करना पड़ा है। ज्यादातर चेहरों को या तो हार के बाद जीत मिली है या फिर एक बार जीतने के बाद वह अपनी कामयाबी को बरकरार नहीं रख सके हैं। ऐसे एक या दो नहीं, बल्कि कई चेहरे हैं। इसमें यहां से पहला चुनाव जीतने वाले समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया भी शामिल हैं, जो अपना पहला चुनाव 1962 में फूलपुर में हार गए थे। अगले ही चुनाव 1967 में यहां से जीत हासिल की। उनके बाद भी यह सिलसिला आगे चलता रहा।
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यहां के पहले चुनाव में डॉ. राम मनोहर लोहिया से हारने वाले कांग्रेस के सत्य नारायण मिश्र 1971 के चुनाव में जीत हासिल करने में कामयाब रहे। जिले की सियासत में भगवा खेमे के सबसे मजबूत चेहरा रहे रामप्रकाश त्रिपाठी को भी 1971 के अपने पहले चुनाव में जनसंघ के टिकट से शिकस्त का सामना करना पड़ा था। हालांकि अगले ही चुनाव में वह भारतीय लोक दल के टिकट से जीते थे। मूलरूप से फर्रुखबाद निवासी चंद्रभूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू ने 1991 के चुनाव में कांग्रेस से दावेदारी की, लेकिन हार गए। उसके बाद 1996 में भाजपा का दामन थामकर जीत हासिल की।
अब तक 11 चेहरे बने सांसद, पांच ने हार से किया आगाज
कन्नौज संसदीय सीट पर अब तक हुए 16 चुनाव में कुल 11 चेहरों को सांसद बनने का मौका मिला है। इसमें सबसे ज्यादा पांच चेहरों ने अपनी पहली जीत से पहले के चुनाव में शिकस्त का सामना किया था। तीन चेहरे ऐसे रहे, जिनका आगाज तो जीत से हुआ, लेकिन बाद में शिकस्त मिली। तीन चेहरों को यहां कामयाबी मिली। उन्हें कभी शिकस्त का सामना नहीं करना पड़ा।
इन्हें हार के बाद मिली जीत
- डॉ. राम मनोहर लोहिया, सोशलिस्ट पार्टी: 1962 में अपना पहला चुनाव फूलपुर से हारे। 1967 में हुए अगले चुनाव से कन्नौज से जीत हासिल हुई।
- एसएन मिश्र, कांग्रेस: 1967 में अपने पहले चुनाव में डॉ. राम मनोहर लोहिया के सामने हारे। अगले चुनाव में कांग्रेस का परचम लहराते हुए जीत हासिल की।
- रामप्रकाश त्रिपाठी : 1971 में अपने पहले चुनाव में जनसंघ के टिकट से हारे। अगले चुनाव में 1977 में बीएलडी के टिकट से जीते। उसके बाद जनता पार्टी और भाजपा के टिकट पर लड़े, लेकिन जीते नहीं।
- चंद्रभूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू: 1991 में पहली बार कांग्रेस के टिकट से मैदान में आए। नाकामी मिली। अगली बार 1996 में भाजपा के टिकट से लड़कर जीते। उसके अगले चुनाव में 1998 में शिकस्त मिली।
- सुब्रत पाठक, भाजपा: पहली बार 2009 में भाजपा के टिकट से खड़े हुए। तीसरे नंबर पर रहे। अगली बार 2014 में दूसरे नंबर पर रहे। 2019 में तीसरी बार की कोशिश कामयाब हुई और जीत हासिल हुई।
यह कामयाबी नहीं रख सके बरकरार
- शीला दीक्षित, कांग्रेस: 1984 में जीतीं, 1989 में हार गईं
- डिंपल यादव, सपा: 2012, 2014 में जीतीं, 2019 हारीं
- छोटे सिंह यादव: 1980 में जीते, 1984 हारे, 1989, 1991 में जीते, 1996 में शिकस्त
यह रहे अपराजेय
- प्रदीप यादव, सपा: 1998 में लड़े और जीते
- मुलायम सिंह यादव, सपा:1999 में लड़े और जीते
- अखिलेश यादव, सपा: 2000, 2004, 2009 में लड़े और जीते