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इत्रनगरी: सियासी खुशबू ने मेहमानों को लुभाया, चुनाव में बाहर से आए सियासतदानों को अवाम ने सिर-आंखों पर बैठाया

Sat, 30 Mar 2024 07:16 PM IST
शिखा पांडेय तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज

सार

कन्नौज संसदीय सीट से चुनाव जीतने वालों में जिले या लोकसभा क्षेत्र से बाहर के चेहरे ज्यादा रहे हैं। अब तक हुए लोकसभा के चुनाव में सिर्फ दो बार 1977 और 2019 में स्थानीय चेहरों को मौका मिला है। इसके अलावा हर बार बाहर के लोगों को यहां के मतदाताओं ने हाथों हाथ लिया।
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अपने पहले चुनाव के दौरान कन्नौज के इत्र कारखाने में जानकारी करते अखिलेश यादव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देश-दुनिया को अपनी खूशूब से मदहोश करने वाली इत्रनगरी का सियासी दंगल मेहमानों को खूब रास आया है। चुनाव में बाहर से आए सियासतदानों को कन्नौज की अवाम ने सिर-आंखों पर बैठाया है। फिर चाहे पहले सांसद डॉ. राम मनोहर लोहिया हों, या उसके बाद शीला दीक्षित और मुलायम सिंह जैसे दिग्गज सियासी चेहरे। खूशबू के शहर की अवाम ने इन्हें हाथोंहाथ लिया और अपनों पर तरजीह देकर दिल्ली पहुंचा दिया।
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देश की चौथी लोकसभा के चुनाव के दौरान वर्ष 1967 में गठित कन्नौज संसदीय सीट पर अब तक कुल 16 बार चुनाव हो चुके हैं। इसमें वर्ष 2000 और 2012 का उपचुनाव भी शामिल है। इन चुनावों के दौरान सिर्फ दो बार ही ऐसा मौका आया है जब वोटरों ने कन्नौज संसदीय सीट से ताल्लुक रखने वाले चेहरों को मौका दिया है। उसके अलावा हर बार या तो जिले के बाहर का रहा है या संसदीय सीट से उसका सीधा ताल्लुक नहीं रहा है। शुरू के दो चुनाव में ही बाहर के चेहरों पर भरोसा करके उन्हें सदन तक पहुंचाया गया। इसमें पहले चुनाव में जीते डॉ. राम मनोहर लोहिया और दूसरे चुनाव में जीते सत्यनारायण मिश्र भी शामिल हैं।
 

लोहिया मूलरूप से अंबेडकर नगर और सत्यनारायण मिश्र प्रयागराज के रहने वाले थे। आपातकाल के बाद वर्ष 1977 में हुए तीसरे चुनाव के दौरान पहला मौका आया जब कन्नौज के बाशिंदों ने कन्नौज संसदीय सीट से ही ताल्लुक रखने वाले छिबरामऊ के उधरनपुर निवासी रामप्रकाश त्रिपाठी को अपना नुमाइंदा चुना। उसके बाद फिर से बाहरी उम्मीदवारों की कामयाबी का सिलसिला चला पड़ा, जो पिछले चुनाव 2019 में जाकर थमा। 1977 से 2019 के बीच 42 साल बाद कन्नौज के बाशिंदों ने शहर के पठकाना मोहल्ला के रहने वाले सुब्रत पाठक पर भरोसा जताया। इस बीच हर बार बाहर के चेहरों पर ही प्यार बरसता रहा।

पहले ही चुनाव से शुरू हुआ बाहरियों की जीत का सिलसिला
कन्नौज संसदीय सीट से बाहरी उम्मीदवारों की जीत का सिलसिला 1967 में हुए पहले चुनाव से ही पड़ गया था। पहले ही चुनाव में मुख्य मुकाबला दो बाहरी उम्मीदवारों डॉ. राम मनोहर लोहिया और कांग्रेस के एसएन मिश्र के बीच हुआ था। दूसरे चुनाव में कांग्रेस के एसएन मिश्र ने जीत हासिल की थी। तीसरे चुनाव के दौरान 1977 में चली कांग्रेस विरोधी लहर के बीच सभी मुख्य विपक्षी दल एक होकर लड़े तो लोगों ने बीएलडी के टिकट से मैदान में उतरे स्थानीय उम्मीदवार रामप्रकाश त्रिपाठी को जीत दिलाई। उसके बाद किसी स्थानीय को जीत हासिल करने में चार दशक से ज्यादा का समय लग गया। 2019 में सुब्रत पाठक की जीत से बाहरी उम्मीदवारों की जीत का सफर थमा।

यह हैं बाहरी उम्मीदवार, जिन्हें जनता का मिला प्यार
 
निर्वाचित सांसद  निवासी जीते
डॉ. राम मनोहर लोहिया अंबेडकर नगर 1967
सत्यनारायण मिश्र प्रयागराज 1971
छोटे सिंह यादव फर्रुखाबाद 1980, 89, 91
शीला दीक्षित उन्नाव  1984
चंद्रभूषण सिंह  फर्रुखाबाद 1996
प्रदीप यादव इटावा  1998
मुलायम सिंह यादव इटावा  1999
अखिलेश यादव इटावा 2000, 2004, 2009
डिंपल यादव इटावा  2012, 2014
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दो बार ही जनता का भरोसा जीत पाए घरवाले
- छिबरामऊ के उधरनपुर निवासी रामप्रकाश त्रिपाठी वर्ष 1977 में भारतीय लोकदल के टिकट पर जीते। उसके पहले जनसंघ, बाद में जनता पार्टी और फिर भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर कई बार लड़े, लेकिन कामयाबी नहीं मिली।
- शहर के पठकाना मोहल्ला निवासी सुब्रत पाठक पहली बार वर्ष 2009 और फिर 2014 में भाजपा के टिकट पर लड़े। तीसरी बार 2019 में जब वह मैदान में आए तो पहली बार कामयाबी हासिल की।
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