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युद्धविराम न होता हो लाहौर में गाड़ देते तिरंगा 

Sat, 16 Dec 2017 05:15 PM IST
सुरजीत तिवारी, अमर उजाला, कानपुर
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भारत-पाकिस्तान 1971 युद्ध विशेष
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वर्ष 1971 का भारत-पाक युद्ध 13 दिन तक चला। भारतीय सेना की बेहतरीन रणनीति और जज्बे से जीत हासिल हुई थी। इसमें शिरकत करने वाले वीरों को पाकिस्तान का युद्धविराम आज भी अखरता है। उन पलों को याद करते हुए सैनिकों को लाहौर पर कब्जा करने की तमन्ना आज भी अखरती है। 
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इस ऐतिहासिक युद्ध में 16 दिसंबर 1971 की तारीख विश्व में सबसे बड़ी जीत की गवाह बनी। सैन्य रिकॉर्ड के अनुसार युद्ध में पाकिस्तान के लगभग 93 हजार सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था। वहीं, हमारे देश के 3630 वीरों की शहादत के अलावा 9056 घायल और 213 लापता हुए। इस लड़ाई में कई जाने-अनजाने नायकों ने अपनी भागीदारी निभाई।  
 

युद्ध का इतिहास 

भारत-पाकिस्तान 1971 युद्ध विशेष
पूर्वी पाकिस्तान का स्वतंत्रता संग्राम 3 दिसंबर 1971 से 16 दिसंबर 1971 के बीच हुआ। इस पर युद्ध विराम पाकिस्तान के ढाका समर्पण के साथ हुआ। इस युद्ध की पहल पाकिस्तान ने भारतीय वायुसेना के 11 स्टेशनों पर हवाई हमले से की। परिणाम स्वरूप भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान में बांग्लादेशी स्वतंत्रता संग्राम में बंगाली राष्ट्रवादी गुटों के समर्थन में कूद पड़ी। 13 दिन चलने वाला यह युद्ध इतिहास में दर्ज लघुतम युद्धों में से एक है। 
 

हवाई हमले भी जारी थे

भारत-पाकिस्तान 1971 युद्ध विशेष
 ‘3 गढ़वाल राइफल यूनिट में कैप्टन था। युवा होने के नाते हमारा आत्मविश्वास बहुत अधिक था, हम पूरे हौसले के साथ शंकरगढ़ सेक्टर में वेस्ट बार्डर लाहौर की ओर आगे बढ़ चुके थे, बस एक हफ्ते युद्ध और चलता तो लाहौर में तिरंगा गाड़ देते। जब पाकिस्तान के सैनिक पीछे हटते वह माइंस (बारूद) बिछाते जाते। इधर हवाई हमले भी जारी थे। जीवन पर पाकिस्तान के लाहौर जीतने का मलाल रह गया’ 
कर्नल किशन सिंह, कृष्णापुरम 

‘इन दिनों में पश्चिम बंगाल के हाशिमआरा में सीनियर प्रशासनिक पाकिस्तान से हमने हवाई लड़ाई तीन दिन में जीत ली थी, हमारे एयरक्राफ्ट जाते और आर्मी के लिए हमला कर रास्ता बनाते। इस युद्ध में हमारे एकमात्र सीनियर अफसर शहीद हुए थे। उनके एयरक्राफ्ट औैर शरीर का काफी तलाश के बाद पता नहीं चला। यह दुख हमेशा सताता रहेगा। हमने अपने एयरबेस (एयरपोर्ट) को कोई हानि नहीं पहुंचने दी’
कर्नल एसएम सिंह, श्याम नगर, कानपुर 
 

दीपावली के दिन युद्ध के लिए जाने का आर्डर मिला

भारत-पाकिस्तान 1971 युद्ध विशेष
‘देहरादून हेडक्वार्टर में था, दीपावली के दिन युद्ध के लिए फिरोजपुर (पंजाब) जाने का आर्डर मिला। वह एक नया अनुभव था, जब हमारी फंसी गाडिय़ों को बरस रहे गोले बारूद के बीच स्थानीय लोग ट्रैक्टर्स की मदद से निकालते। वह हमारे लिए खाना, नाश्ता बिना अपनी जान की परवाह किए पहुंचाते। अगर सभी बार्डर पर देश भक्ति के लिए वैसा ही माहौल हो जाए तो दुश्मन हमारी तरफ आंख उठाकर नहीं देख सकता’
कर्नल केएल कौशल , परदेवनपुरवा, लालबंगला कानपुर

‘इस लड़ाई की नींव पाकिस्तान से 1965 में हुई लड़ाई में पड़ी थी। 1971 की लड़ाई में पाक एयरफोर्स के ट्रेनिंग सेंटर को भारी नुकसान पहुंचाना चाहता था। एंटी एयरक्राफ्ट गन से सरहद पर उनके राशन लाने वाले एयरक्राफ्ट पर हमले कर नष्ट किए। उनके सैनिक पांच दिनों तक भूखे लड़ रहे थे। बाद में पाक अधिकारियों ने सरेंडर किया’ 
जूनियर वारंट ऑफीसर जेपी सिंह चौहान, श्यामनगर, कानपुर
 
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इसके बाद बमबारी शुरू हो गई

भारत-पाकिस्तान 1971 युद्ध विशेष
‘हमलोग पठानकोट ऑफिस में चाय पी रहे थे, 3 दिसंबर की शाम 5:45 बजे एयरक्राफ्ट उड़ने की आवाज सुनाई दी। लगा की यूनिट का होगा, हम लोग बाहर निकलकर देखने लगे। कॉलोनी के लोग चिल्लाने लगे। इसके बाद बमबारी शुरू हो गई। पीएम इंदिरागांधी कोलकाता में थीं, उन्होंने वॉर शुरू होने की बात कही। हम लोग रात में कुछ खास नहीं कर सके। पाक रातभर गोलाबारी करता रहा। इससे हमारी बिल्डिंग तबाह हो गई। हमने टेंट का सहारा लिया। हमारी एंटी एयरक्राफ्ट गन ने पाक के कई एयरक्राफ्ट खत्म कर दिए। दुश्मनों का पीछा करते हुए गए हमारे विंग कमांडर संधू को दो दुश्मन जहाजों ने घेर लिया। उन्हें लैंड करने को कहा। एक उनके आगे, दूसरा पीछे। इसबीच वो आगे वाले जहाज को ओवरटेक कर चमका देकर वापस लौट आए। हम लोग टेंट, बंकर में ही रहे’
फ्लाइंग आफीसर ज्ञानपाल सिंह, सनिगवां रोड, कानपुर

‘जम्मू के पास सांभा में गोला-बारूद की यूनिट थी, वहां से रसद भारतीय सैनिकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी थी। सैनिकों के पास स्टॉक समाप्त होने के पहले ही दुश्मन से बचाकर पहुंचना बड़ी चुनौती थी। युवा जोश था, देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा था। इस लड़ाई में शामिल सभी को मेडल भी मिला। देश भक्ति से प्रेरित होकर मैंने अपने बेटे (ब्रिगेडियर) और पोते को भी सेना में भेजा है। आज भी देश के लिए हमेशा तैयार हूं, समाज को अपना योगदान दे रहा हूं। ’
कर्नल केके सिंह, श्यामनगर, कानपुर
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