रामदयाल कोरी को दीं गईं अमानवीय यातनाएं
एक रात क्रांतिकारी रामदयाल कोरी ने पीपल के वृक्ष की सबसे ऊंची व पतली डाल पर तिरंगा फहरा दिया। पेड़ की डाल इतनी पतली थी कि उस पर चढ़कर झंडा उतारना संभव नहीं था। आखिर थक कर अंग्रेज अफसरों ने उस पेड़ को ही काट डाला। वहीं रामदयाल कोरी को जेल भेज कर अमानवीय यातनाएं दीं गईं।
महाराज छत्रसाल ने दी थी रावत की उपाधि
मुगल सेना पन्ना के महाराज छत्रसाल को पराजित करने जा रही थी। जराखर गांव के पास डेरा डाले सेना पर गांव के युवाओं ने हमला बोल दिया। अंधेरी रात में मुगलों के रक्त की प्यासी तलवारें चमक उठीं। जराखर के युवाओं ने मुगल सेनापति का सिर धड़ से अलग कर महाराज छत्रसाल को भेंट किया।
राजा गद्दी छोड़कर रावत का सम्मान करे
उनकी बहादुरी से खुश होकर छत्रसाल ने ग्रामीणों को रावत (बहादुर) की उपाधि दी। खिलत सेला मण्डील और खड़ी ताजीम की प्रतिष्ठा बख्शी। इसका अर्थ था जब भी जराखर निवासी पन्ना के दरबार में पहुंचें, तो राजा गद्दी छोड़कर रावत का सम्मान करे।
इन 52 क्रांतिकारियों ने जंगे आजादी में दिया योगदान
श्रीपत सहाय रावत, शांतिदेवी, राजाबेटी रावत, आनंदी लाल, हरनाथ सिंह, सुखलाल, भोजराज, सुंदरीदेवी, जियालाल, चंद्रभान, घनश्याम, देव जू, कुंजबिहारी, गोरेलाल, सुखलाल, झुन्नूलाल, ईश्वरानंद दास, गयादीन, हीरामन, मुरलीधर, रामदयाल, मूलचंद्र, जगरूप, जियालाल, झुम्मकलाल, नाथूराम, रामसेवक शामिल रहे।
इसके अलावा राजा बेटी, प्रताप सिंह, किशोर सिंह, रामनारायण, खुरखर, भद्दी, सुम्मेरा, कुंजबिहारी, इंद्रजीत, कीरत सिंह, पंचम लुहार, रामदयाल, जगन्नाथ, बैजनाथ, गोरेलाल, जगन्नाथ, मटोला, दिल्लीपत सिंह, रामलाल, दसईं महतों, देशरानी, परमा, रामभरोसे, राजाराम चतुर्वेदी ने जंगे आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।