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मैं लावारिस नहीं हूं

Fri, 15 May 2015 02:00 AM IST
अमर उजाला कानपुर
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तीन दिन तक एक मां को उसके नवजात बच्चे से दूर रखने वाले, उसे लावारिस बताने वाले मेडिकल कॉलेज के बेरहम डॉक्टरों ने ‘अमर उजाला’ में मुद्दा उठने पर गर्दन फंसती देख आनन-फानन नवजात को मां की गोद में डाल दिया। बेटा मिलने की खुशी में मां ने अपने दर्द की भी परवाह नहीं की, कमजोर शरीर में न जाने कहां से इतनी ताकत आ गई कि पैदल ही बेटे को लेने चल पड़ी। मां ने डॉक्टर की गोद में बेटे को देखा तो अपना आंचल फैला दिया। डॉक्टर समझा रहे थे कि कैसे बेटे को रखना है, क्या करना है लेकिन मां को यह सब सुनाई ही नहीं दे रहा था। वह तो आंचल फैलाए एकटक कलेजे के टुकड़े को देख रही थी। डॉक्टर ने बेटे को उसकी ओर बढ़ाया तो आंखों से आंसू झरने लगे। गोद में बेटा आया तो उसे सीने से चिपका लिया। अब तक बदहवास इधर-उधर भटक रहा पिता भी भावुक होने लगा। पति ने पत्नी की ओर देखा, बेटे को पा लेने खुशी दोनों के चेहरे पर साफ झलक रही थी। मां ने बेटे को पिता की गोद में दिया तो उसने बेटे को चूम लिया।
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मामला यूं है कि अजईखेड़ा थाना बारासगवर उन्नाव निवासी दिनेश की पत्नी किरन ने 11 मई की सुबह जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के जच्चाबच्चा अस्पताल में 1.05 किलोग्राम के लड़के को जन्म दिया था। कमजोरी के चलते लड़के को जच्चाबच्चा अस्पताल से बालरोग विभाग के एसएनसीयू में भेज दिया गया। दो घंटे बाद परिजनों ने एसएनसीयू जाकर बच्चे को देखा। इसके बाद परिजनों को बच्चा नहीं दिखाया गया। एसएनसीयू का स्टाफ आमतौर पर इन्फेक्शन वगैरह का हवाला देकर परिजनों को नवजात से दूर रखता है लेकिन 12 मई की सुबह जब परिवार के लोग एसएनसीयू पहुंचे तो नर्सों ने कह दिया कि तुम्हारा लड़का तो यहां भर्ती ही नहीं है। अनपढ़ मां और परिजन हक्का-बक्का रह गए। लाख दुहाई दी पर साहबों ने कह दिया सो कह दिया। और तो और बाद में बच्चे को लावारिस घोषित कर पुलिस को सूचना दे दी। मां और परिजन 13 मई को भी रोते-गिड़गिड़ाते रहे लेकिन डॉक्टर नहीं पसीजे और कहा कि अब बच्चा अनाथालय जाएगा। ‘अनाथ’ सुनकर मां का कलेजा फट पड़ा। जिसके मां-बाप मौजूद हैं, उसे अनाथ कैसे कह दिया। 13 मई को ‘अमर उजाला’ ने डॉक्टरों के बेशर्म रवैये और मां के दर्द को प्रकाशित किया तोमेडिकल कॉलेज प्रशासन को अपने कर्तव्यों की याद आई। पुलिस के साथ लिखा-पढ़ी की और मां को बुलाने को कहा।

प्रिंसिपल ने की तत्काल कार्रवाई
गुरुवार को प्रिंसिपल प्रो. नवनीत कुमार ने बच्चे के संबंध में बाल रोग के विभागाध्यक्ष से बात की। कानूनी प्रक्रिया पूरी कर बच्चे को उसके माता-पिता को हैंडओवर करने के निर्देश दिए। इसके बाद तेजी से प्रक्रिया शुरू हुई और कुछ घंटों में मां को उसका लाल मिल गया।
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लिखकर दो, 24 घंटे गायब थे
बाल रोग विभाग ने परिवार से लिखवाया कि बच्चा पैदा होने के बाद परिवार के लोग 24 घंटे अस्पताल से गायब थे। कहा गया कि यह लिखकर नहीं दोगे तो बच्चा नहीं मिलेगा। किसी ने एक पन्ने पर लिखा और परिवार वालों से दस्तखत करा लिए गए। पिता दिनेश ने कहा कि वह तो शुरू से ही अस्पताल में था। उसे नहीं मालूम की क्या लिखवाया गया है। वह अनपढ़ है।

लापरवाही नहीं, मिस अंडरस्टैंडिंग हुई
बाल रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. यशवंत राव ने कहा कि बच्चे को लेकर कोई लापरवाही नहीं हुई है। थोड़ी मिस अंडरस्टैंडिंग हुई। परिवार वालों ने लिखकर दिया है कि वह बच्चा भर्ती कराने के बाद गायब हो गए थे। लिखा-पढ़ी के बाद बच्चा सौंपा जा रहा है।

गोद हुई आबाद
किरन को एक साल पहले बेटी हुई थी। पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ पड़ी लेकिन कुछ दिन बाद बेटी की तबियत खराब रहने लगी और तकरीबन सवा महीने बाद उसकी मौत हो गई। अब फिर किरन की गोद आबाद हुई तो व्यवस्था ने ही उसे उसके लाल से अलग कर दिया।

रो पड़ी नानी
बच्चा मिलने के बाद किरन की मां यानी बच्चे की नानी रो पड़ी। उसे पढ़ना-लिखना नहीं आता, अखबार में क्या छपता है नहीं पता लेकिन उसे किसी ने यह बता दिया था कुछ ‘छपा’ है, इसीलिए बच्चा मिला है। वह हाथ जोड़-जोड़कर दुहाई दे रही थी। बार-बार दोहराती रही कि आप लोग न होते तो बच्चा न मिलता।




मक्कारी के बोल (13 मई को कहा था)
डॉक्टर देंगे अनाथालय को सूचना
हैलट चौकी प्रभारी जेपी शाही ने कहा था कि बाल रोग विभाग में बच्चे का इलाज चल रहा है। अब यह कानूनी मामला हो गया है। अब वहीं के डॉक्टर अनाथालय या चाइल्ड लाइन को सूचना देंगे। बच्चा वहीं रहेगा। कानूनी प्रक्रिया के बाद जो निर्णय आएगा उसी का पालन कराया जाएगा।

कानूनी प्रक्रिया के बाद मिलेगा बच्चा
बाल रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. यशवंत राव ने कहा था कि बच्चा तो अब कानूनी प्रक्रिया के बाद ही मिलेगा। यह पूछने पर कि जब बच्चे की मां अस्पताल में ही भर्ती है और बच्चे के परिजन डॉक्टर से मिलने आते थे तो उन्हें भगा दिया जाता था, डॉ. राव ने कहा कि कोई नहीं आया था।
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