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इस मंदिर में दशहरे पर हाेती है रावण की पूजा, जुटता है भक्ताें का हुजूम

Wed, 12 Oct 2016 01:23 AM IST
गौरव शुक्ला, अमर उजाला कानपुर
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रावण की पूजा कर लाेग मांगते हैं अाशीर्वाद
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यह अास्था ही ताे है कि जब पूरा देश रावण दहन कर खुशियां मनाता है ताे कुछ लाेग एेसे भी हैं जाे रावण की 205 साल पुराने मंदिर में विशेष अराधना करते हैं। 'लंकापति रावण की जय' अाैर 'जय लंकेज' के नारे लगे हैं। यह पूजा केवल दशहरे के दिन ही हाेती है। मंगलवार काे भी दशहरे के दिन मंदिर का कपाट सिर्फ एक घंटे के लिए खुला अाैर हजाराें की संख्या में भक्ताें ने पूजा की। एेसी मान्यता है कि इस दिन इस मंदिर में रावण की पूजा करने वालाें काे विशेष वरदान मिलता है। अागे पढ़िए क्या खास है इस मंदिर में? क्याें जुटता है भक्ताें का हुजूम? 
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मां छिन्नमस्तिका का प्रहरी लंकापति रावण

यही वह रावण की प्रतिमा है जिसकी पूजा करने के लिए भक्ताें का लगता है रेला - फोटो : अमर उजाला, कानपुर

रावण प्रकांड पंडित होने के साथ-साथ भगवान शिव का परम भक्त था। भगवान शिव काे प्रसन्न  करने के लिए देवी आराधना भी करता था। मां की अाशीष भी उसपर थी। बताया जाता है कि उसकी पूजा से प्रसन्न हाेकर मां छिन्नमस्तिका ने उसे वरदान दिया था कि उनकी की गई पूजा तभी सफल हाेगी जब भक्त रावध की भी पूजा करेंगे। बताया जाता है कि करीब 205 साल पहले करीब संवत 1868 में तत्कालीन राजा ने मां छिन्नमस्तिका का मंदिर बनवाया था अाैर रावण की करीब पांच फुट की मूर्ति उनके प्रहरी के रूप में बनवाई थी। विजयदशमी के दिन मां छिन्नमस्तिका की पूजा के बाद रावण की आरती हाेती है अाैर मंदिर सरसों के दीपक अाैर पीले फूल चढ़ाए जाते हैं। पुजारी के अनुसार मंदिर में तेल व पीला फूल चढ़ाने से ग्रह शांत हाेते हैं अाैर जीवन में खुशिया अाती हैं।

 
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दूर हाेते हैं ग्रह दाेष

ग्रह दाेष से मिलती है मुक्ति

मान्यता है कि यहां रावण काे तेल अाैर पीले फूल चढ़ाने से भक्ताें के ग्रहाें के सारे दाेष समाप्त हाे जाते हैं अाैर घर में खुशिया अा जाती हैं। मंदिर के पुजारी केके तिवारी ने बताते हैं कि मंदिर पर लाेगाें की अास्था है यही कारण है कि प्रत्येक दशहरे के दिन हजाराें की संख्या में भक्त यहां पूजा करने के लिए अाते हैं।
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