रोगियों में जीन अधिक एक्टिव मिले
न्यूरो साइंसेस प्रमुख डॉ. मनीष सिंह ने बताया कि सिर की चोट के रोगियों के इलाज में अलग-अलग रिस्पांस मिलता है। एक ही तरह की स्थिति के कुछ रोगी तो ठीक हो जाते हैं और कुछ गंभीर हो जाते हैं। रोगी क्यों गंभीर होते हैं? इसे जानने के लिए प्लाज्मा रिसिसटिन, एनएसई, एमडीए और एसओडी का अध्ययन किया गया। जांच में पाया गया कि गंभीर होने वाले रोगियों में ये जीन अधिक एक्टिव मिले।
सिर की चोट के बहुत से रोगियों की जान बचाई जा सकेगी
ये जीन अधिक सक्रिय होने पर प्रोटीन बनाने लगते हैं। इसके साथ ही कुछ इंजाइम का रिसाव शुरू हो जाता है। इससे मस्तिष्क के घावों में दिक्कत बढ़ती है और स्थिति गंभीर हो जाती है। रोगी की हालत बिगड़ने लगती है। अगर नुकसान पहुंचाने वाले इंजाइम के लेवल को कम कर दिया जाए, तो मर्ज गंभीर नहीं होने पाएगा। उन्होंने बताया कि अब इस अध्ययन की जरूरत है कि संबंधित जीन की वजह से रिसने वाले इंजाइम के लेवल कम करने में कौनसी दवाएं कारगर रहेंगी। इससे सिर की चोट के बहुत से रोगियों की जान बचाई जा सकेगी।
स्पाइनल कॉर्ड के शोध को मंजूरी मिली
स्पाइनल कॉर्ड के रोगियों की स्थिति गंभीर करने के लिए जिम्मेदार की जीन पर शोध किया जाएगा। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के न्यूरो साइंसेस विभाग में यह शोध किया जाएगा। शोध के लिए केंद्रीय मेडिकल रिसर्च यूनिट (एमआरयू) ने मंजूरी दे दी है। शोध के लिए केंद्र सरकार फंड देती है। न्यूरो साइंसेस प्रमुख डॉ. मनीष सिंह ने बताया कि हेड इंजरी ट्रॉमा के बाद अब स्पाइनल कॉर्ड पर शोध किया जाएगा।