तब जेसीपी ने इंस्पेक्टर को कार्रवाई के निर्देश दिए
मृतक के घर से लेकर रेलवे पटरी पर पहुंचकर छानबीन की। पीड़ित परिवार मंगलवार को संघर्ष सेवा समिति के नेतृत्व में जेसीपी आंनद प्रकाश तिवारी से मिला। यहां किसान की दोनों बेटियां रूबी और काजल की आंखों से आंसू निकलते देख जेसीपी ने इंस्पेक्टर को कार्रवाई के निर्देश दिए। न्याय संघर्ष समित के पदाधिकारियों ने कहा कि किसान के परिवार की जान को खतरा है। पीड़ित परिवार को सुरक्षा देने की मांग की।
सीधे-साधे किसान को भरोसे में लेकर हड़पी थी जमीन
चकेरी गांव में 6.29 करोड़ की जमीन हड़पे जाने से आहत होकर जान देने वाले किसान बाबू सिंह यादव ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे। यही कारण था कि बेशकीमती जमीन के मालिक होने के बाद भी उन्होंने कभी इसे गंभीरता से नहीं लिया। इसका फायदा उठाकर ही बीजेपी नेता (पूर्व जिला पंचायत सदस्य, मैनपुरी) डॉ. प्रियरंजन आशु दिवाकर ने उनकी करोड़ों की जमीन हड़प कर उसका बंदरबांट कर लिया।
सात साल पहले तैयार हो गई थी पटकथा
पुलिस ने नेता समेत छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली, लेकिन रसूख के चलते उन पर कार्रवाई से बच रही है। किसान बाबू सिंह की जमीन हड़पने की पटकथा सात साल पहले तैयार हो गई थी। करोड़ों की विवादित जमीन को बाबू सिंह के नाम करवाने का ठेका उनके भतीजे जितेंद्र ने अपने साढ़ू टटिया झनाका निवासी बबलू यादव (भाजपा नेता का ड्राइवर) की मदद से भाजपा नेता डॉ. प्रियरंजन को दिलवाया था।
जमीनी लेखाजोखा का बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं
शुरुआत में डॉ. प्रियरंजन ने जमीन बाबू सिंह के नाम चढ़वाने और उसे बिकवाने तक की जिम्मेदारी ली थी। इसके बाद उसने अपने साथ एक अधिवक्ता, अपने साले व राहुल जैन, मधुर पांडेय व शिवम चौहान को भी जोड़ लिया। मृतक की पत्नी बिटान का आरोप है कि डॉ. प्रियरंजन को कुछ ही दिनों यह पता चल गया था कि बाबू सिंह हाईस्कूल पास हैं और जमीनी लेखाजोखा का बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं है।
दूसरों के नाम रजिस्ट्री करवा दी
इसी का फायदा उठाते हुए डॉ. प्रियरंजन ने पहले विवादित जमीन को बिना बाबू सिंह को भनक लगे उनके नाम करवाया। इसके बाद धोखाधड़ी करते हुए 6.29 करोड़ रुपये में दूसरों के नाम रजिस्ट्री करवा दी। इस पूरे खेल में बीजेपी नेता ने कहीं भी अपने नाम पर जमीन संबंधी कोई भी लिखापढ़ी नहीं करवाई, जिससे पुलिस को उसके खिलाफ कोई साक्ष्य न मिल सके।
कौड़ियों के भाव रही जमीन की बढ़ी कीमत बन गई जान की दुश्मन
अपनी नानी पूसा देवी के गोदनामे के बाद वसीयत में अहिरवां मौजा में बाबू सिंह को मिली 10 बीघे जमीन की कीमत पहले कौड़ियों के भाव हुआ करती थी। जमीन की अचानक बढ़ी कीमत उसकी जान की दुश्मन बन गई। बाबू सिंह यादव और जितेंद्र के पिता स्व. अमर सिंह सगे भाई थे। इसके बाद भी बाबू सिंह की नानी पूसा देवी ने सिर्फ उनके नाम ही वर्ष 1978 में जमीन की वसीयत की थी।
जितेंद्र को अखरती थी यही बात
इसमें अलग-अलग आराजी की करीब आठ बीघा जमीन मथुरापुर और दो बीघा जमीन लोधन पुरवा गांव में है। परिजनों के अनुसार उस वक्त इस जमीन की महज पांच से 10 हजार रुपये प्रति बीघा थी। समय के साथ इसकी कीमत आसमान छूने लगी। यही बात जितेंद्र को अखरती थी। इसलिए उसने जमीन को ठिकाने लगाने के लिए भाजपा नेता डॉ. प्रियरंजन की मदद ली। भाजपा नेता ने कम समय में बाबू सिंह के पूरे परिवार को विश्वास में ले लिया था। वह जो कहता था पूरा परिवार उसी बात को पत्थर की लकीर मान लेता था।