सभी प्रतिष्ठानों की जांच शुरू कर दी गई है। इन्हीं में से एक मेसर्स नवरून चैरिटेबल फाउंडेशन ने दर्शनपुरवा का पता पंजीकृत कराया था और सौ कर्मचारी दिखाए थे। जब प्रवर्तन अफसरों ने निरीक्षण किया तो मौके पर कुछ नहीं मिला। प्रतिष्ठान ने 320 दावों के जरिये 45 लाख 62 हजार 764 रुपये की पीएफ निकासी की।
इसी तरह मेसर्स दीपक ठेकेदार ने दिसंबर 2020 से दिसंबर 2021 तक 104 दावों के जरिये 12 लाख 98 हजार रुपये की निकासी की। जांच में पता चला है कि इस मामले में लाभ लेने वाले ईपीएफ स्कीम 1952, ईपीएस स्कीम 1995 के सदस्य ही नहीं हैं।
देशभर के कार्यालयों में फर्जीवाड़ा
पीएफ विभाग के देशभर में 121 क्षेत्रीय कार्यालय हैं। इसके अलावा 17 जोनल कार्यालय हैं। सूत्रों के अनुसार इन सभी में छोटे या बड़े स्तर पर करीब 27 हजार मामले मिले हैं, जिन्होंने बोगस कंपनियां बनाकर फर्जीवाड़ा किया है या इसकी आशंका है। दिल्ली स्थित नेशनल डेटा सेंटर ने इन सभी मामलों को फ्रीज कर दिया है। वहीं सूत्रों का कहना है कि विभाग केे इतिहास में आज तक इतना बड़ा फर्जीवाड़ा नहीं हुआ है।
नियोक्ता वही, कर्मचारी भी नहीं
आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना में 24 फीसदी अंशदान सरकार की ओर से किया जा रहा था। इसलिए किसी भी प्रकार के चालान या रिटर्न की जरूरत नहीं थी। इसी का फायदा उठाकर फर्जीवाड़ा किया गया। दरअसल, कंपनियां फर्जीवाड़ा करने के लिए बनाई गईं थी। नियोक्ता बने फर्जी व्यक्ति ने खुद ही कर्मचारी के दावे दाखिल किए और पीएफ की रकम निकालते गए। नवरून मामले में 320 दावे आए थे, जबकि दीपक ठेकेदार के मामलों में 104 दावों के जरिये भुगतान निकाला गया।
यह थी सरकार की योजना
कोविड महामारी के दौरान सामाजिक सुरक्षा लाभ और रोजगार के नुकसान की भरपाई के साथ-साथ नए रोजगार के सृजन, नियोक्ताओं को प्रोत्साहित करने के लिए एक अक्तूबर 2020 को योजना लाई गई थी। योजना में बड़े पैमाने पर नई कंपनियों ने पंजीकरण कराया था। बाद में पंजीकरण की अंतिम तारीख 30 जून 2021 से बढ़ाकर 31 मार्च 2022 कर दी गई थी।