अभी तक महाराष्ट्र के नासिक पर निर्भर है शहर
फूलों के बाजार में मराठी की जगह अब कनपुरिया जरबेरा की खुशबू बिखरेगी। सजावट से उपहार तक हर शख्स की पहली पसंद जरबेरा उत्पादकों की आय के नजरिये से भी काफी मुफीद है। बिधनू के मझावन गांव निवासी चंद्र मोहन रावत ने पॉली हाउस का निर्माण कर जरबेरा की खेती शुरू की है। उनका दावा है कि जिले में वह जरबेरा के पहले उत्पादक होंगे। 15 जनवरी के बाद उनके खेतों का जरबेरा बाजार में उपलब्ध होगा।
सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद चंद्र मोहन और उनके बेटे आशीष ने फूलों का व्यावसायिक उपयोग के लिए उत्पादन शुरू किया है। दो माह पहले ही उन्होंने उद्यान विभाग से बात कर पॉली हाउस का निर्माण किया और खेती को जमीन तैयार कराई। इसमें 15 लाख का खर्च आया। इसके बाद कर्नाटक के बंगलूरू की कंपनी फ्लोरेंस फ्लोरा से 35 रुपये के हिसाब से 6300 पौधे मंगवाए। कंपनी ने लाल, पीला, गुलाबी, सफेद, मिरांडा कलर के फूलों के पौधे हालैंड से मंगा कर दी है। उन्होंने बताया कि पौधरोपण के बाद लगभग 60 दिनों में फूल तैयार होने लगे हैं। 15 जनवरी के बाद से उनके खेतों में उगे जरबेरा के फूल बाजार में उपलब्ध होंगे।
एक हजार फूल रोजाना
चंद्र मोहन ने बताया कि जरबेरा पौधे की आयु तीन वर्ष की होती है। एक पौधे से प्रतिमाह लगभग 50 से 60 फूल मिलते हैं। उन्होंने बताया कि कानपुर में फूलों के लगभग 15 बड़े व्यापारी हैं। यहां रोजाना 800 से 1000 जरबेरा के फूलों की खपत है।
अभी नासिक से लाते हैं
किदवईनगर के फूल कारोबारी कौशल, महेश, राजेश और दिनेश ने बताया कि वह नासिक (महाराष्ट्र) से जरबेरा के फूल लाते हैं। यहां दस फूलों वाला एक पैकेट 50 रुपये का पड़ता है। व्यापारियों का कहना है कि खराब होने के डर से बिना एडवांस ऑर्डर के बाहर से फूल नहीं मंगाते। अब यह दिक्कत खत्म हो जाएगी।
पॉली हाउस के निर्माण से उम्मीद है कि आने वाले समय में और भी लोग इसी तरह फूलों की खेती के लिए प्रोत्साहित होंगे। साथ ही कई किस्म की सब्जियां भी ऐसी हैं, जिनका पॉली हाउस में उत्पादन किया जा सकता है।
- सीपी अवस्थी, जिला उद्यान अधिकारी