पुलिस इंस्पेक्टर राम शिरोमणि पांडेय उर्फ डंडा पांडेय का नाम कानपुर के लोगों को आज भी याद है। समाज में उनकी छवि एक सख्त पुलिस अफसर की थी। अपराधियों में उनकी दहशत थी। कुछ लोग उन्हें एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहने लगे थे। वर्ष-2000 में वह बिठूर थानाध्यक्ष बनकर आए थे।
कई थानों का कार्यभार संभालने के बाद वह जिले में रहते हुए इंस्पेक्टर बने। वह आगरा में डिप्टी एसपी भी रहे। वहां भी अपनी सख्त कार्यशैली से चर्चा में रहे। करीब सात साल पहले इलाहाबाद में हुए सड़क हादसे में उनका निधन हो गया। अपराधियों के खिलाफ चलाई गई उनकी मुहिम की आज भी मिसाल दी जाती है।
राम शिरोमणि पांडेय हाथ में छोटा डंडा लेकर चलते थे। मुखबिर तंत्र मजबूत होने से बदमाशों का उनसे बचना मुश्किल था। आला अफसर भी उनकी काबिलियत और कार्यशैली के कायल थे। नजीराबाद थाने में उनकी पोस्टिंग के दौरान टायर कारोबारी बीनू भाटिया का अपहरण हो गया था। अपहर्ताओं ने बीनू की रिहाई के बदले एक करोड़ रुपये की फिरौती मांगी थी। राम शिरोमणि ने मुखबिर तंत्र व अपनी टीम को सक्रिय किया। मामले में मैनपुरी के एक पूर्व विधायक को भी उठाया।
कोतवाली में तत्कालीन सीओ (अब आईपीएस) के दफ्तर में पूर्व विधायक को रखा और छोटे से डंडे की दम पर जानकारी जुटाई। साथ ही बीनू को अपहर्ताओं के चंगुल से सुरक्षित छुड़ाने में सफलता पाई। इसके बाद वह ‘डंडा पांडेय’ के नाम से चर्चित हो गए। बीनू अपहरण कांड के खुलासे के बाद वह एसआई से इंस्पेक्टर बने। फीलखाना थाना प्रभारी रहते हुए राम शिरोमणि ने एक पान मसाला कारोबारी से एक करोड़ की फिरौती वसूलने के आरोपी संजय ओझा को मुठभेड़ मे मार गिराया था। तब प्रदेश की सबसे बड़ी एक करोड़ रुपये से ज्यादा रिकवरी हुई थी।
इसके बाद शातिर शिशुु पंडित, पप्पू, अमरेंद्र अवस्थी समेत कई अपराधियों को भी उन्होंने मुठभेड़ में मार गिराया। उस समय उनके संपर्क में रहे व्यापारी बताते हैं कि राम शिरोमणि का बदमाशों में जबरदस्त खौफ था, लेकिन जनता से उनके रिश्ते अच्छे थे। व्यापारी और दुकानदार उन्हें खुद अपराधियों के बारे में सूचनाएं देते थे। इसके चलते राम शिरोमणि ने कई बड़े खुलासे किए थे।