समय से पहले होने की वजह से इनके अंग पूर्ण रूप से विकसित नहीं होते। इसलिए इन्हें दूध पचाने में भी कठिनाई होती थी। एक माह से भी अधिक समय अस्पताल में रहकर धीरे-धीरे सांस लेने व आंतों की क्षमता में सुधार हुआ। कई बार एंटीबायोटिक दवाओं का सहारा लेना पड़ा। साथ ही, कई बार खून भी चढ़ाना पड़ा।
प्री-मैच्योर बच्चों के फेफड़े विकसित नहीं थे
डॉ. गांधी ने बताया कि प्री मैच्योर बच्चे में शरीर का हर अंग कमजोर होता है। खासतौर पर ब्रेन और फेफड़े। इन बच्चों के भी फेफड़े विकसित नहीं होने से सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। इसलिए पहले 15 दिन तक सभी बच्चों को ऑक्सीजन पर रखा। डॉक्टरों व स्टॉफ ने महीने भर 24 घंटे इलाज कर बच्चों की जान बचाई।
बच्चों को जीवित रखना बड़ी चुनौती थी
उन्होंने बताया कि बच्चों का वजन बहुत कम था। उनके लंग्स, हार्ट व शरीर के अन्य अंग कमजोर थे। लंग्स मैच्योर नहीं होने से उसे सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी। बच्चों को जीवित रखना डॉक्टर व अस्पताल स्टॉफ के लिए बड़ी चुनौती थी। प्रसूता को जुड़वा बच्चों के साथ अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया है।
प्री-मैच्योर बेबी को चाहिए विशेष देखभाल
प्री-मैच्योर बेबी यानी समय से पहले जन्म लेने वाले शिशु कई बार गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। ऐसे में गर्भावस्था के दौरान व प्री-मैच्योर डिलीवरी के बाद महिलाओं को विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान सावधानी बरतकर प्री-मैच्योर शिशुओं की जान बचाई जा सकती है।