बच्चों के बीमार पड़ने पर माता-पिता खुद दवाएं खरीदकर न दें। खास तौर पर जुकाम और डायरिया में एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं पड़ती। कुछ माता-पिता डॉक्टर पर एंटीबायोटिक लिखने का दबाव बनाते हैं। एंटीबायोटिक अधिक खाने से व्यक्ति रिसेस्टेंट हो जाता है। फिर उस पर एंटीबायोटिक असर नहीं करती।
यह बात भारतीय बाल रोग अकादमी के बैनर तले एंटीबायोटिक पर आयोजित कार्यशाला में कही गई। बाल रोग विशेषज्ञों ने तय किया कि कम से कम दवाएं देंगे और जरूरत पड़ने पर ही एंटीबायोटिक लिखेंगे।
बताया गया कि 30 सालों से किसी नई एंटीबायोटिक की खोज नहीं हुई है। अगर व्यक्ति रिसेस्टेंट हो गया तो इलाज में दिक्कत होती है। लोगों को जागरूक किया जाए कि नीम-हकीमों से दवाएं न ले।