शाक्त उपासना पद्धति में नवरात्र का विशेष महत्व है। इसमें मां आदिशक्ति की साधक पर विशेष कृपा होती है। ज्योतिषीय, खगोलीय और पौराणिक आख्यान इसकी पुष्टि करते हैं। भगवान श्रीराम ने इसी शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन समुद्र तट पर पूजा का प्रारंभ किया था और उसके 10वें दिन लंका पर विजय प्राप्त की थी। यह जीव और आत्मा के संदर्भ में एक संकेत है कि नौ दिनों में साधना और आंतरिक चेष्टाओं से जीव आत्मदर्शी हो सकता है और उसका आत्म मिलन संभव है।
इंडियन कॉउसिंल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइंसेज (रजि.) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं चितंक इंस्टीट्यूट ऑफ वैदिक साइंसेज के संस्थापक रमेश चिंतक ने बताया कि चार नवरात्रों (दो गुप्त नवरात्र मिलाकर) में शारदीय नवरात्र का साधना और सिद्धि की दृष्टि से विशेष महत्व है। मां दुर्गा की 9वीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविद्याएं अनंत सिद्धियों की दात्री हैं। इनकी आगम और निगम दोनों प्रक्रियों से साधनाएं होती हैं।
परिवर्तनों के साथ-साथ शरीर के रसायन में भी बदलाव
डेमो पिक
यदि खगोलीय महत्व की बात करें तो चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्र में पृथ्वी की गति में आकस्मिक रूप से बदलाव आता है, मौसम बदलता है। पृथ्वी का यह गति परिवर्तन कई प्रकार से मौसम इत्यादि के परिवर्तनों के साथ-साथ शरीर के रसायन में भी परिवर्तन करते हैं। यह दोनों संधि काल है। इसलिए वार्षिक संध्या का समय होता है। इसी समय पृथ्वी की गति में यह परिवर्तन साधना की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। दोनों नवरात्र में पृथ्वी की गति के इस सूक्ष्म बदलाव को महसूस किया जा सकता है। हजारों वर्षों से साधक व्रत, उपवास रख कर सात्विक तरीके से एकांत में रात्रि को ध्यानस्थ होते हैं जिससे वेे इस गति परिवर्तन को अनुभव कर सकें। यह अनूठा अनुभव होता है। कई लोग अपने सिर पर ज्वारे रखते हैं।
एक स्थान पर बैठ जाते हैं, कठिन तपस्या करते हैं। सिर्फ इसलिए कि उन्हें इस खगोलीय परिवर्तन की घटना की अनुभूति हो सके और इसी अनुभूति को सिद्धि कहा जाता है। क्योंकि इस अनुभूति से पृथ्वी तत्व के कई रहस्यों का उद्घाटन होता है। साधक अपने शरीर से अलग होने का अनुभव करता है। इस अलगाव का एहसास ही परम सिद्धि है। दुनिया में जितनी भौतिक वस्तुएं हैं यह सभी पृथ्वी तत्व है। स्थूल शरीर भी पृथ्वी तत्व है।
भारतीय मान्यताओं में हमने पृथ्वी को मां माना है और प्रकारान्तर से हम देवी उपासना के माध्यम से इसी पृथ्वी तत्व को प्रसन्न करते हैं। प्रकृति ने सभी मनुष्यों में हवा, पानी, रोशनी, चंद्रमा की शीतलता समान रूप से दी है। प्रकृति में कोई भेदभाव नहीं है किंतु पृथ्वी तत्व की कृपा से एक मनुष्य साधन संपन्न, संपत्तिवान, भूमि का स्वामी, राजा बनता है। यह सिर्फ पृथ्वी तत्व की दया पर निर्भर करता है। यह बात वास्तु ग्रंथ के रचयिता भगवान विश्वकर्मा भी कहते हैं कि यह भूमि ही बता सकती है कौन सा मनुष्य कितना संपन्न हो सकता है। पृथ्वी माता की कृपा के बिना संपन्नता, संपत्ति, ऐश्वर्य की प्राप्ति असंभव है, क्योंकि वह इन विभूतियों की माता है।