11 अप्रैल 1987 को शहर के विनोद दीक्षित अस्पताल का शुभारंभ करतीं तत्कालीन सांसद शीला दीक्षित
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पिछले चार दशक से एक अदद जीत के लिए तरस रही कांग्रेस की झोली इस बार भी खाली न रह जाए। दो दशक से कांग्रेस का चुनाव चिन्ह भी ईवीएम से गायब है। रायबरेली और अमेठी में सपा की ओर से प्रत्याशी नहीं उतारने के बदले में यहां कांग्रेस नैतिकता की दुहाई देते हुए अपना उम्मीदवार नहीं खड़ा करती है। चुनावी अखाड़े से लगातार बनी दूरी से यहां संगठन लगातार कमजोर होता गया और जमीन पर पार्टी का दायरा भी सिकुड़ता गया। इस बार तो बाकायदा सपा से गठबंधन यहां पार्टी दावेदारी नहीं पेश करेगी।
यह सही है कि कन्नौज संसदीय सीट पर कांग्रेस को कभी वह कामयाबी नहीं मिल सकी है, जो आसपास के इलाकों में मिली है। अपने गठन के बाद से अब तक हुए 16 चुनाव में देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी को सिर्फ दो बार ही कामयाबी मिली है। आखिरी जीत चार दशक पहले 1984 में मिली थी। उसके बाद से एक अदद जीत पार्टी के लिए सपना बनकर रह गई है। आखिरी जीत के बाद दो दशक तो पार्टी ने कोशिश भी की, लेकिन फिर रायबरेली और अमेठी में सपा की ओर उम्मीदवार नहीं उतारने के बदले में कांग्रेस ने भी नैतिकता की दुहाई देते हुए यहां से उम्मीदवार नहीं उतारा। रायबरेली में सोनिया गांधी और अमेठी में राहुल गांधी के समर्थन में बिना गठबंधन के ही सपा की ओर से उम्मीदवार नहीं उतारा जाता रहा है। कांग्रेस भी दोस्ती निभाते हुए कन्नौज के दंगल से दूर रहती है।
गठबंधन की गांठ मजबूत करने को ईवीएम से गायब रहेगा हाथ
इस बार चूंकि बाकायदा कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन हुआ है। इसके तहत कन्नौज की सीट सपा के हिस्से में चली गई है। इससे साफ हो गया है कि पिछले चार चुनाव की ही तरह इस बार के चुनाव के दौरान ईवीएम पर कांग्रेस का हाथ नहीं दिखेगा।
शीला की पहली जीत कांग्रेस की आखिरी कामयाबी
वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में शीला दीक्षित पहली बार यहां से सांसद बनी थीं। उनकी यही पहली जीत यहां कांग्रेस के लिए आखिरी कामयाबी साबित हुई। उसके बाद से अब तक कांग्रेस को यहां कभी कामयाबी नहीं मिली है। कांग्रेस को पहली बार यहां जीत वर्ष 1971 के चुनाव में मिली थी, तब पार्टी उम्मीदवार एसएन मिश्र सांसद चुने गए थे। दूसरी बार कामयाबी 1984 के चुनाव में मिली थी। तब पार्टी के टिकट पर शीला दीक्षित ने तत्कालीन संसद व लोकदल के प्रत्याशी छोटे सिंह यादव को हराया था। 1989 के अगले चुनाव में शीला दीक्षित अपनी सीट बरकरार रखने में नाकाम रही थीं।
आखिरी बार 2004 में उतरा था उम्मीदवार
कांग्रेस ने इस सीट पर आखिरी बार 2004 में उम्मीदवार उतारा था। विनय शुक्ला उम्मीदवार थे। उन्हें उस चुनाव में 10 हजार 501 वोट ही मिले थे। लिस्ट में चौथा नंबर हासिल हुआ था। उस चुनाव में सपा के अखिलेश यादव लगातार दूसरी बार यहां से सांसद निर्वाचित हुए थे। उन्होंने तीन लाख से ज्यादा वोट से जीत हासिल की थी।
कांग्रेस के टिकट से लड़े उम्मीदवार
- 1967 एसएन मिश्र, उपविजेता
- 1971 एसएन मिश्र, विजेता
- 1980 बलराम सिंह यादव, पराजित
- 1984 शीला दीक्षित, विजेता
- 1989 शीला दीक्षित, उपविजेता
- 1991 चंद्रभूषण सिंह, पराजित
- 1996 रामअवतार दीक्षित, पराजित
- 1998 प्रतिमा चतुर्वेदी, पराजित
- 1999 दिग्विजय सिंह राना, पराजित
- 2000 कोई उम्मीदवार नहीं (उपचुनाव)
- 2004 विनय शुक्ला, पराजित
- 2009 कोई उम्मीदवार नहीं
- 2012 कोई उम्मीदवार नहीं (उपचुनाव)
- 2014 कोई उम्मीदवार नहीं
- 2019 कोई उम्मीदवार नहीं