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अब गिद्ध-दृष्टि ही बचा सकती है चंबल से विलुप्त होते इन गिद्धों की जान

Sun, 25 Dec 2016 11:45 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
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चंबल क्षेत्र से विलुप्त हो रहे गिद्ध
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चंबल से विलुप्त होते गिद्धों की जान अब केवल गिद्ध-दृष्टि ही बचा सकती है। पर्यावरण के रक्षक के रूप में पहचानी जाने वाली गिद्ध प्रजाति संरक्षण के अभाव में पूरे देश से समाप्त होने की कगार पर खड़ी है। एक अनुमान के मुताबिक 40 साल पहले जहां देश में लगभग चार करोड़ गिद्ध थे तो अब चार लाख भी नहीं बचे हैं। गिद्धों की संख्या में आयी इस तेज़ गिरावट के बाद भी सरकार की नींद नहीं टूटी है।
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पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में गिद्ध की अहम भूमिका है, लेकिन इनकी प्रजाति यमुना व चंबल क्षेत्र से लगभग विलुप्त हो चुकी है। इनके विलुप्त होने का मुख्य कारण लगातार हो रहे अंधाधुंध रसायनों का प्रयोग व प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग है। गिद्धों के विलुप्त होने से ही पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा मिल रहा है, क्योंकि यह गिद्ध मृत पशुओं को खाकर पर्यावरण संरक्षण में सहायक थे। करीब 15 वर्ष पहले यहां गिद्धों की भारी संख्या थी। कृषि के लिए उपयोग में लाए जाने वाले रसायन भी इनकी विलुप्त होने के कारण माने जाते हैं। पर्यावरण विदों के अनुसार इनके विलुप्त होने का मुख्य कारण पशुओं को बुखार होने पर लगाया जाने वाला टीका डाइक्लोफिनैक सोडियम है। जिसका असर पशु के मरने के बाद तक भी रहता है। पशु चिकित्सक इस टीके को बुखार, सूजन और दर्द की स्थिति में लगाते हैं। इस टीके का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। इसके प्रयोग से पशु तो ठीक हो जाता है, लेकिन पशु के मरने के बाद गिद्धों के खाने पर पशु का मांस उनके विलुप्त होने का कारण बन जाते है। हालांकि सरकार ने इस टीके पर प्रतिबंध लगाया है मगर अभी भी यह टीका खूब बिक रहा है। पर्यावरण के रक्षकों का भक्षण जारी है। आसमान में कभी-कभार ही अब गिद्ध दिखाई देते हैं। जो समय के साथ विलुप्त होते जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि जब तक हम प्राकृतिक स्रोतों का सदुपयोग नहीं करेंगे तब तक गिद्ध जैसे पर्यावरण के सहायक पक्षियों को नहीं बचा सकते हैं।
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