कानपुर के विकास नगर निवासी हीरा कारोबारी उदय देसाई ने सीबीआई अफसरों को खरीदकर कोई पहली बार ऐसा कारनामा नहीं किया। इससे पहले भी वे बैंक, टैक्स और कस्टम्स के अफसरों को नोटों की गड्डियों के जरिये अपना मुरीद बना चुके हैं।
यही वजह है कि कानपुर की 14 बैंकों ने महज 200 करोड़ रुपये की संपत्ति बंधक रखकर करीब तीन हजार करोड़ रुपये का लोन थमा दिया। लगातार लिमिट बढ़ने के बाद वर्ष 2018 में इनके खाते एनपीए हो गए। इस मामले में सीबीआई पहले ही इन पर केस दर्ज कर चुकी है।
बताते चलें कि उदय देसाई और उनके बेटे सुजय देसाई से 10 लाख रुपये रिश्वत लेने के मामले में सीबीआई ने अपने ही अफसरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की है। कुल नौ नामजद लोगों के अलावा 10 अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई है। इसमें सीबीआई के दो डीएसपी रैंक के अफसर भी शामिल हैं। सीबीआई मुख्यालय ने बैंक धोखाधड़ी मामले की जांच कर रही टीम को हटाकर नई टीम तैयार की है।
बैंक अफसर दिखा चुके हैं दरियादिली
सीबीआई में केस दर्ज होने के बाद भी बैंक उदय देसाई पर दरियादिली दिखाते रहे। दरअसल केस दर्ज होने के बाद देसाई ने पूरे कर्ज के बदले 1500 करोड़ में समझौते का प्रस्ताव दिया था। एक बार ठुकराने के बाद बैंकों ने इसे दोबारा स्वीकार कर लिया था। बताते हैं कि इसमें भी रिश्वत चली थी। हालांकि देसाई अपने इस प्रस्ताव में भी खरे नहीं उतरे। समझौते की रकम का 10 फीसदी हिस्सा बतौर टोकन मनी जमा न कर पानेकी वजह से यह डील कैंसिल हो गई थी।
कागजों में ही फैलता रहा कारोबार
उदय देसाई का समूचा कारोबार कागजों में ही फैलता रहा। इनकी कंपनियां मर्चेटिंग ट्रेड स्कीम का दुरुपयोग कर पैसों के राउंड ट्रिपिंग में शामिल थीं। स्कीम में आवश्यक बैंक धनराशि हासिल करने के लिए इन्होंने अपने वित्तीय विवरणों में फेरबदल किया और कई विदेशी संस्थाओं को काल्पनिक डेबिट नोट जारी किए, जो कि उनके ही नियंत्रण में थी।
इस तरह इन्होंने करीब 3500 करोड़ की धोखाधड़ी की। इसी तरह की धोखाधड़ी में रोटोमैक ग्रुप के मालिक विक्रम कोठारी के साथ शामिल रहे। दोनों कारोबारियों ने बैंकों को कुल 8000 करोड़ रुपये का चूना लगाया। यह सब अफसरों के आगे चढ़ावा चढ़ाने की वजह से ही संभव हो सका।