घटना 24 नवंबर 2016 की तड़के करीब 4:30 बजे की है। तत्कालीन उपनिरीक्षक शैलेश कुमार पांडेय अपनी पुलिस टीम के साथ में गश्त पर थे। पुलिस का आरोप था कि मंडी समिति के पास संदिग्ध अवस्था में खड़े संजीव दुबे ने पुलिस को देखकर भागने का प्रयास किया और खुद को घिरता देख जान से मारने की नीयत से पुलिस टीम पर तमंचे से फायर कर दिया।
पुलिस कर्मियों ने झुककर अपनी जान बचाई और मशक्कत के बाद उसे पकड़ लिया। अपर सत्र न्यायाधीश प्रथम पारूल जैन की अदालत ने सुनवाई के दौरान इस पर आश्चर्य व्यक्त किया कि पुलिस बल हथियारबंद होने के बावजूद आरोपी द्वारा फायरिंग किए जाने पर भी जवाबी फायरिंग क्यों नहीं की। सबसे बड़ी चूक बरामद तमंचे और कारतूस को विधि विज्ञान प्रयोगशाला न भेजना माना गया।
अदालत ने कहा कि बिना बैलिस्टिक एक्सपर्ट की रिपोर्ट के यह साबित नहीं होता कि हथियार चालू हालत में था। न्यायालय ने कहा कि घटनास्थल काफी भीड़भाड़ वाला इलाका होने के बावजूद किसी भी गवाह या राहगीर को शामिल नहीं किया गया। सभी गवाह केवल पुलिसकर्मी ही थे जिनके बयानों में अदालत को विरोधाभास मिला।
न्यायालय ने निर्णय में स्पष्ट किया कि एक आपराधिक मामले में दोष सिद्धि के लिए अभियोजन को आरोप संदेह से परे साबित करने होते हैं। इस मामले में पुलिस न तो घटनाक्रम को सही साबित कर पाई और न ही बरामदगी को विश्वसनीय बना सकी। न्यायालय ने कहा कि संदेह के मामलों में निर्दोष को सजा दिलाने से बेहतर है कि आरोपी को दोषमुक्त किया जाए।
न्यायालय ने संजीव दुबे को धारा 307 के आरोप से दोषमुक्त कर दिया। वर्तमान में जेल में निरुद्ध आरोपी को रिहा करने के आदेश दिए गए हैं साथ ही उसे धारा 437-ए के तहत भविष्य में उच्च न्यायालय में उपस्थित होने के लिए जमानत और बंधपत्र जमा करने का निर्देश दिया गया है।