इन्हीं आधारों पर 31 दिसंबर 1984 को पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट भी लगा दी थी। एसआईटी ने गुडवर्क दिखाने के लिए झूठा फंसा दिया। वही एडीजीसी संजय कुमार झा ने तर्क रखा कि विवेचना के दौरान कई चश्मदीद गवाहों ने बयान दर्ज कराए। इन बयानों में रविशंकर और गंगाबख्श का नाम सामने आया है। वे दंगे, लूटपाट और आगजनी में भीड़ का हिस्सा थे।
वर्ष 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के दौरान कुल 18 मुकदमे दर्ज हुए थे। सबसे ज्यादा गोविंद नगर थाने में सात, नौबस्ता में चार, नजीराबाद, अर्मापुर, किदवई नगर में दो-दो तथा एक मुकदमा पनकी थाने में दर्ज हुआ था। किदवईनगर थाने में दर्ज हुए मुकदमे में 26 आरोपी बनाए गए हैं। इनमें से 11 जेल में बंद हैं। शुक्रवार को कोर्ट ने इनमें से दो आरोपियों की जमानत अर्जी पर सुनवाई कर अर्जियां खारिज कर दीं। -संजय कुमार झा, एडीजीसी
सभी आरोपियों की गिरफ्तारी न होने तक एसआईटी की कार्रवाई अधूरी : भोगल
अखिल भारतीय सिख दंगा पीड़ित राहत कमेटी के अध्यक्ष कुलदीप सिंह भोगल शुक्रवार अधिवक्ता संग शहर पहुंचे। उन्होंने एसआईटी के डीआईजी बालेंदु भूषण से मुलाकात कर कार्रवाई की प्रगति जानी। अब तक की हुई गिरफ्तारियों के लिए उन्होंने डीआईजी को प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया। वहीं पीड़ित परिवारों से भी मिले। उन्होंने ने कहा कि मामले में जब तक सभी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होती, तब तक एसआईटी की कार्रवाई अधूरी ही है।
भोगल ने बताया कि कानपुर में 96 आरोपियों के नाम प्रकाश में आए थे, इनमें से 73 जीवित हैं। 22 आरोपियों को एसआईटी गिरफ्तार कर चुकी है। 51 की गिरफ्तारी बाकी है। वे बंबा रोड गुमटी नंबर पांच पहुंचे, यहां कुलदीप सिंह, अवतार सिंह और महेंदर सिंह मिलकर उनका हौसला बढ़ाया। इसके बाद निराला नगर में पीड़ित परिवार से मिले।
झारखंड के बोकारों में भी हुई थी 60 सिखों की हत्या
भोगल ने बताया कि कानपुर में कार्रवाई पूरी होने के बाद यहां काम करने वाली उनकी कमेटी झारखंड के बोकारो में काम करेगी। वहां भी 60 लोगों की हत्या हुई थी, जिनके आरोपियों के बारे में अब तक कुछ पता नहीं चल सका है। उन्हें भी सलाखों के पीछे पहुंचाना है।