कन्नौज के सांसद के रूप में आवाज उठाएंगे अखिलेश
खुद अखिलेश लगातार तीसरी बार जीतकर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे। इस बार भी इस सीट से न सिर्फ उन्होंने सबसे ज्यादा चार बार चुनाव जीतने का नया रिकॉर्ड बनाया, बल्कि सपा फिर से सूबे की सबसे बड़ी और देश की तीसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। सपा के कन्नौज जिलाध्यक्ष कलीम खान कहते हैं कि पार्टी मुखिया अखिलेश यादव कन्नौज के सांसद के रूप में आवाज उठाएंगे।
खुद कई बार दे चुके हैं कन्नौज से रिश्ते की दुहाई
न सिर्फ चुनाव लड़ने के दौरान बल्कि उसके पहले भी अखिलेश यादव कन्नौज से अपने रिश्ते की दुहाई दे चुके हैं। चुनाव में प्रचार के दौरान उन्होंने अपने पहले चुनाव की याद साझा करके पुराने कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया था। उसके पहले भी कह चुके हैं यहीं से सियासत शुरू की है। यहां के हर गांव-गली से वाकिफ हैं, वह इसे कभी नहीं छोड़ सकते हैं। कार्यकर्ताओं की ही मांग पर नामांकन प्रक्रिया खत्म होने के ठीक एक दिन पहले उनकी उम्मीदवारी का ऐलान हुआ था।
पहली बार खुद लिया जीत का प्रमाण पत्र
इस चुनाव में एक और खास बात देखने को मिली है, जो अखिलेश यादव को कन्नौज से जोड़े रखने की तरफ इशारा करती है। इसके पहले अखिलेश यादव यहां से तीन बार सांसद चुने जा चुके हैं। कभी भी अपनी जीत का प्रमाण पत्र लेने यहां नहीं आए थे। इस बार नतीजा आने के दूसरे दिन लखनऊ से यहां आकर कलक्ट्रेट पहुंचे और डीएम शुभ्रांत शुक्ल से जीत का प्रमाण पत्र हासिल किया। उनके पहले डिंपल यादव और मुलायम सिंह यादव के जीतने पर भी प्रमाण पत्र उनके चुनाव एजेंट गुड्डू सक्सेना लेते रहे हैं।
15 साल पुराना दोहराया इतिहास
यह पहली बार नहीं है कि अखिलेश यादव को कन्नौज से लेकर सियासी कयासबाजी हो रही है। अब से ठीक 15 साल पहले भी यही स्थिति थी। 2009 के चुनाव में अखिलेश यादव कन्नौज के साथ ही फिरोजाबाद संसदीय सीट से भी चुनाव जीते थे। फिरोजाबाद से भी बड़ी जीत कन्नौज से ही मिली थी। इसलिए उन्होंने कन्नौज की सीट बरकरार रखते हुए फिरोजाबाद से इस्तीफा दिया था। इस बार वह करहल से विधायक और कन्नौज से सांसद हैं।
मुख्यमंत्री बनने पर कन्नौज के सांसद पद से देना पड़ा था इस्तीफा
2012 के विधानसभा चुनाव में जब प्रदेश में सपा को बहुमत मिला तो अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। उस समय वह कन्नौज से सांसद थे। मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभालने के नाते उन्हें संसद सदस्यता छोड़नी थी। ऐसी सूरत में उन्होंने यहां से इस्तीफा दिया था। यहां से नाता बरकरार रहे, इसलिए अपनी छोड़ी हुई सीट पर हुए उपचुनाव में पत्नी डिंपल यादव को चुनाव लड़ाया था। तब वह निर्विरोध ही सांसद निर्वाचित हुई थीं।