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पांच वर्ष में केले की खेती से 20 लाख सालाना पहुंचाई आय, लॉकडाउन में 50 से ज्यादा ग्रामीणों को दिया रोजगार

Wed, 22 Jul 2020 05:10 PM IST
शिखा पांडेय प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
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केले की खेती से 20 लाख सालाना पहुंचाई आय - फोटो : अमर उजाला
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कोरोना संक्रमण की वजह से हुए लॉकडाउन में जब शहरी लोगों के हाथों से रोजगार छिन रहा था, तब भीतरगांव ब्लॉक के बेहटा बुजुर्ग गांव के अखिलेश सिंह बाहरी राज्यों से आए लोगों को रोजगार दे रहे थे। आय भले ही सीमित रही हो, लेकिन प्रवासियों और आसपास के गांवों के तमाम बेरोजगारों को जिंदगी आगे बढ़ाने का जरिया मिला।
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अखिलेश सिंह कोई उद्योगपति नहीं हैं, बल्कि साधारण से किसान हैं, जिन्होंने कम खेती वाले तमाम किसानों के लिए एक नजीर पेश की है। अखिलेश सिंह केले की खेती करके सालाना 20 से 25 लाख रुपये कमाते हैं। नौबस्ता से 30 किलोमीटर दूर धरमपुर बंबा के किनारे सात किलोमीटर और आगे संकरे रास्ते पर चलने के बाद मिलता है बेहटा बुजुर्ग गांव।

यहां हर गांव की तरह गेहूं, धान, दलहन आदि की परंपरागत खेती ही होती है। पांच साल पहले इस गांव के किसान अखिलेश सिंह को अखबारों में प्रगतिशील किसानों की खबरें पढ़कर कुछ नया करने की प्रेरणा मिली। उन्होंने केले की खेती शुरू करने का फैसला किया। संवेदनशील फसल होने की वजह से लोगों ने उन्हें डराया।
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चूंकि वे कुछ नया करने की ठान चुके थे, इसलिए डरते-डरते ही सही, पहली बार में एक बीघा खेत से केला की खेती शुरू की। केले की फसल 14 महीने में तैयार होती है। लंबे इंतजार के बाद उनके सामने अप्रत्याशित सफलता थी। उन्होंने सारे खर्च निकालकर करीब एक लाख रुपये की बचत की।

यह अन्य तरह की फसलों के मुकाबले कहीं अधिक आय थी। इससे उनका हौसला बढ़ा। वे प्रत्येक वर्ष एक से दो बीघा केले की फसल का रकबा बढ़ाते गए। वर्तमान में उनके साढ़े सात बीघा खेत में केले की फसल खड़ी है। एक बीघा खेत उन्हें एक से सवा लाख रुपये की बचत देकर जाता है।

इस तरह से सिर्फ फसल के बूते वे 10 लाख रुपये सालाना बचा रहे हैं। खेती में सफलता मिलने के बाद उन्होंने गांव में ही प्लांट लगाकर केला पकाकर बाजार में बेचने का व्यवसाय भी शुरू कर दिया है। इस तरह से उन्हें सालाना 10 से 15 लाख रुपये की और बचत होती है। यह सब बीते पांच वर्षों में हुआ है।

लॉकडाउन में कई घरों को मिला काम 
लॉकडाउन में जब लोग बेरोजगार होकर घरों में बैठे थे, तब अखिलेश सिंह ने 50 से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया। 15-20 लोग तो स्थायी रूप से काम करते ही हैं। लॉक डाउन में जब माल का आवागमन रुका तो बेरोजगारों को बुलाकर केले की गांव-गांव फेरी लगवाई। जब कहीं कुछ न मिल रहा हो तब केला मिल जाए तो क्या कहने। यह फंडा खूब चला। गांव-गांव केला खूब बिका। बेरोजगारों के हाथों में कुछ पैसे आए। बीते चार महीने में इन्होंने गांव और आसपास के 50-60 लोगों को केला बेचकर कमाई करने का तरीका सिखा दिया है। सूरत से आए एक परिवार को तो उन्होंने अपने ही यहां रख लिया। युवक इनके खेतों और प्लांट में काम पाकर खुश है।
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लाभ देखकर बेटे को उतारा खेती में 
अखिलेश के दो बेटे हैं। बड़ा बेटा हरिओम सिंह डिफेंस की तैयारी कर रहा था। खेती में लाभ और काम बढ़ा तो उसे भी इसी काम में आगे बढ़ाने का मन बनाया। अखिलेश कहते हैं कि नौकरी करके ये अपना पेट पालेंगे। गांव में उनके साथ काम करेंगे तो भविष्य में दर्जनों परिवारों को रोजी रोटी देंगे। यह भी देश सेवा से कम नहीं। बेटा हरिओम को भी यह काम रास आया। वो अपने पिता के काम में हाथ बंटाता है। अखिलेश अब आसपास के गांवों के किसानों का कच्चा केला भी खरीदने लगे हैं। 

जिसके पास एक-दो बीघा भी खेत है वो केले की खेती कर सकते हैं। इसमें मेहनत और देखरेख ज्यादा है, मगर लाभ भी उसी अनुपात में है। पांच साल पहले वे इस क्षेत्र में केले की खेती करने वाले एकलौते किसान थे। अब मुझे देखकर तमाम किसानों ने केले की पैदावार शुरू कर दी है। इससे क्षेत्र में लोगों की आय और रोजगार बढ़ा है। हर किसान को अपनी खेती के कुछ हिस्से में कुछ न कुछ नया प्रयोग जरूर करना चाहिए। - अखिलेश सिंह
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