कन्नौज। इत्र नगरी का इतिहास भी निराला है। राजनीति में जिस पर फिदा हो जाए तो कामयाबी ऐसी देती है कि विरोधी जल्द न छू पाएं और नाराज हो जाए तो मिट्टी ही पलीत कर दे। राजनीति में दो चेहरे ऐसे हैं, जो अधिकारी रहे। उसके बाद चुनाव लड़े, लेकिन वोटरों ने उनको नकार दिया। तीसरी बार पूर्व आईपीएस के सिर मौर पहना दिया।
कानपुर में पुलिस कमिश्नर रहे असीम अरुण ने इसी लाल आठ जनवरी को नौकरी से वीआरएस लिया था। उसके बाद उन्होंने भाजपा की सदस्यता ले ली। फिर कन्नौज विधानसभा सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए। 10 मार्च के परिणाम में चुनाव जीतकर उन्होंने कई इतिहास रचे। वे अधिकारी के बाद कन्नौज में राजनीति करने के दौरान पहला ही चुनाव जीत गए। अन्य दो अफसर रहे इससे पहले चुनाव हार चुके हैं। भाजपा के विधायक बने असीम अरुण ठठिया क्षेत्र के मूलरूप से गौरनपुर्वा गांव निवासी हैं।
तिर्वा से लडे़ थे टीएन चतुर्वेदी
बात करते हैं तिर्वा कस्बा निवासी टीएन चतुर्वेदी की, जो आईएएस होने के साथ ही वर्ष 1984 से 90 तक केंद्र सरकार के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक भी रहे थे। उसके बाद उन्होंने भाजपा के टिकट पर वर्ष 1991 में कन्नौज लोकसभा का चुनाव लड़ा था, लेकिन जनता पार्टी के छोटे सिंह यादव से हार गए थे। छोटे सिंह यादव को 36.34 फीसदी यानी 1,72,594 वोट मिले थे। टीएन चतुर्वेदी को 23.46 फीसदी यानी 1,11,419 वोट मिले थे। प्रो. रामबक्श वर्मा तीसरे नंबर पर जनता दल से रहे थे। उनको 1,02,295 यानी 21.54 फीसदी मत ही मिले। इंडियन कांग्रेस से चंद्रभूषण सिंह को 14.42 फीसदी यानी 68,480 वोट ही मिले थे। उस दौरान कुल 13 प्रत्याशी चुनाव लड़े थे। कुल 51.78 फीसदी वोट पड़ा था। 4,74,926 वोट पड़े थे। कुल वोट 9,45,773 था। हालांकि बाद में टीएन चतुर्वेदी राज्यसभा के सदस्य रहे थे।
सीओ रहे विश्राम सिंह कठेरिया की नहीं गली थी दाल
पीपीएस अधिकारी और कन्नौज के तिर्वा में सीओ रहे विश्राम सिंह कठेरिया भी रिटायर होने के बाद सदर विधानसभा सुरक्षित सीट से चुनाव लड़े थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस पार्टी से भाग्य आजमाया और अपनी जमानत तक गवां बैठे। उनको 4871 वोट मिले थे, जो केवल 2.35 फीसदी ही थे। उस दौरान सपा से अनिल दोहरे चुनाव जीते थे। उनको 95,702 वोट मिले थे, जो 46 फीसदी थे। दूसरे नंबर पर बसपा से महेंद्र दोहरे थे। उन्हें 50020 मत यानी 24 फीसदी वोट थे।