‘सर, पुलिस की नौकरी नहीं करना चाहता था। इस नौकरी में ईमानदारी से काम करना बहुत मुश्किल है। सेलेक्शन डिप्टी एसपी के पद पर हुआ है तो ज्वाइन करना ही पड़ेगा। पुलिस विभाग को नई छवि देने की कोशिश करूंगा।’
लोक सेवा आयोग से पीपीएस परीक्षा-2009 का रिजल्ट आने पर ये बातें दिवंगत सीओ जियाउल हक ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मुस्लिम बोर्डिंग हाउस में अपने सीनियर रूम पार्टनर मजीद से कही थीं। हॉस्टल के दिनों को याद करते हुए मजीद बताते हैं कि जियाउल को उनके चाचा शमशाद अहमद ने वर्ष 1997 में अपनी जगह रखवाया था। जियाउल हक में अधिकारी बनने का जुनून था।
बारह साल के लंबे अंतराल में उनकी पढ़ाई-लिखाई, नहाने-खाने, सोने-जागने का रूटीन कभी टूटते नहीं देखा गया। सबसे हंसकर और इज्जत से मिलने के कारण वह पूरे हास्टल के साथियों में लोकप्रिय थे। हॉस्टल के चतुर्थश्रेणी कर्मचारियों को भी कभी तेज आवाज में न पुकारने की आदत के कारण जियाउल सभी के बीच गांधीवादी के रूप में मशहूर थे।
मजीद बताते हैं कि वर्ष 1999 के बाद कई साल तक लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में हॉस्टल का कोई भी छात्र साथी पीपीएस नहीं बना था। वर्ष 2009 की परीक्षा में जियाउल के पीपीएस चयनित होने पर खूब खुशियां मनाई गई थीं। इतने साल के बाद पीसीएस में प्रॉपर रैंक पाने के कारण जियाउल को हॉस्टल का हीरो माना जाने लगा था। सेशन लेट होने के कारण उनके बैच की ट्रेनिंग वर्ष 2010 में शुरू हुई थी। प्रतापगढ़ में उनकी तीसरी पोस्टिंग थी।
मजीद बताते हैं कि इतने शरीफ अधिकारी की जघन्य हत्या से हॉस्टल का एक-एक युवक गमजदां और गुस्से में है। ईश्वर जियाउल हक की आत्मा को शांति और उनके परिजनों को सब्र दें। एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले जियाउल हक ने जिस मेहनत और लगन से वह मुकाम हासिल किया था, मौत से परिवार को बड़ा सदमा लगा है। सीनियर होने के नाते वह मुझसे अक्सर गाइड लाइन्स लेने आते थे। सभी विषयों पर उनकी पकड़ मुझे भी दंग कर देती थी।