राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के साहित्यिक गुरु भले ही महावीर प्रसाद द्विवेदी रहे हों, पर बचपन से काव्य के क्षेत्र में रुझान पैदा करने वाले प्रेरक के रूप में मुंशी अजमेरी को ही याद किया जाता है। इसीलिए तो महाकवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी एक कविता में लिखा था, बजती क्या मैथिली शरण के काव्य कीर्ति की भेरी, मिलते अगर न उनको प्रेरक गुरु मुंशी अजमेरी। अजमेरी जी ने अपने साहित्य में हिंदी के साथ ही बृज और बुंदेली का भी बड़ा सुंदर प्रयोग किया है। चिरगांव में 24 नवंबर 1886 को जन्मे प्रेम बिहारी अजमेरी को लोग प्यार से मुंशी अजमेरी के नाम से संबोधित करते थे। देश के साहित्य जगह में भी उनका यही नाम प्रचलित है। पिता विश्वम्भर जी भी कवि और गायक थे, इससे उनकी काव्य के प्रति अभिरुचि होना स्वाभाविक थी।
न जाने कहां की कसाइन कूबड़ी, औंध में आ के घुसी घर फोड़ू
मुंशी अजमेरी के प्रपौत्र सुधाकर शर्मा बताते हैं कि चिरगांव में राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त व सियाराम शरण गुप्त बचपन से ही मुंशी अजमेरी के मार्गदर्शन में रहे। उन्होंने बताया कि मुंशी जी ने अपने काव्य के जरिए बच्चों में संस्कार डालने का प्रयास किया। उनकी कविताओं में बृज और हिन्दी के अलावा बुंदेली की भी छाप मिलती है। बाल रामायण में मुंशी अजमेरी ने श्रीराम वनवास के प्रसंग में मंथरा के लिए जो कवित्त लिखा ई है, उसमें बुंदेली मुहावरों का बड़ा ही सुंदर प्रयोग है। उन्होंने लिखा है, छकी छल छंद, पकी पर पीड़न, धर्म की छोड़ू, अधर्म की जोड़ू , न जाने कहां की कसाइन कूबड़ी, औंध में आ के घुसी घर फोड़ू।
प्रार्थना सभा में मुंशी अजमेरी के जवाबी भजन को सुनकर मुस्करा उठे थे महात्मा गांधी
सुधाकर शर्मा बताते हैं कि बात 1929 की है, साबरमती आश्रम में प्रार्थनासभा चल रही थी, महात्मा गांधी रघुपति राघव राजाराम गा रहे थे। इस सभा में मुंशी अजमेरी भी मौजूद थे, वह कृष्ण भक्त थे, उन्होंने गांधी जी का प्रार्थना गान समाप्त होते ही इसके जवाब में स्वरचित भजन गाना शुरू कर दिया, माधव मधुसूदन घनश्याम, अधम उधारन राधेश्याम। यह सुनकर बापू खुश हो गए। राष्ट्रपिता से उनकी इतनी निकटता थी कि उनके आग्रह पर वे एक बार चिरगांव भी आए थे।
ओरछा राज्य के अंतिम राजकवि रहे
सुधाकर बताते हैं कि मुंशी अजमेरी आजादी के बाद रियासतों के विलय होने से पहले ओरछा राज्य के आखिरी राज कवि रहे। उन्होंने ओरछा के राजा मधुकरशाह पर काव्य रचना भी की, इसके अलावा उनकी बाल रामायण, प्रेम पराग. सोहराव जैसी रचनाएं राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान रखती हैं। इसके अलावा अब तक अनेक रचनाएं अप्रकाशित हैं जिनके प्रकाशन पर काम चल रहा है।
किंतु क्रूर काल अब सा न रूठा था
झांसी निवासी अग्रसेन महाविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डा. उदय त्रिपाठी बताते हैं कि मैथिली शरण गुप्त से मुंशी अजमेरी के छोटे भाई की तरह संबंध थे, इसीलिए तो उनकी मृत्यु पर राष्ट्रकवि ने लिखा था, जो हमारे घर, सो नहीं है किसी राजा कै, झूठ क्यों कहें हम घमंड में आ गए थे. जग की मौज घर बैठे मिली हमको, किंतु क्रूर काल अब सा न रूठा था। 26 मई 1937 को प्रेम बिहारी अजमेरी ने चिरगांव में अंतिम सांस ली और इस दुनिया को छोड़कर पंचतत्व में विलीन हो गए।