भाजपा को तीन सीटों का नुकसान उठाना पड़ा
अगर हम सियासी समीकरण की बात करते हैं तो बुंदेलखंड का इलाका किसी जमाने में बसपा का मजबूत गढ़ हुआ करता था। बसपा सुप्रीमो मायावती की सोशल इंजीनियरिंग का यहां खासा प्रभाव था। बसपा ने मुस्लिम, ओबीसी, दलित और ब्राह्मणों को साधकर बुंदेलखंड में अपनी जगह बनाई थी, लेकिन 2017 में इस इलाके में भाजपा ने ओबीसी, ठाकुर, ब्राह्मण और दलितों को अपने साथ जोड़कर बसपा को झटका देकर भगवा फहराया दिया था। सभी 19 सीटों पर भाजपा प्रत्याशी जीते थे। लेकिन, इस बार बुंदेलखंड में भाजपा को तीन सीटों का नुकसान उठाना पड़ा।
सबसे बड़ा नुकसान चित्रकूट सदर सीट पर उठाना पड़ा
बांदा की बबेरू सीट से भाजपा के अजय पटेल हार गए। यहां से सपा के विशंभर यादव ने जीत हासिल की। भाजपा को सबसे बड़ा नुकसान चित्रकूट सदर सीट पर उठाना पड़ा। यहां राज्यमंत्री चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय ने अपनी सीट गवां दी। सपा के अनिल प्रधान ने उन्हें शिकस्त दी। उधर, जालौन जिले में भी भाजपा ने एक सीट खो दी। भाजपा ने गठबंधन में कालपी सीट निषाद पार्टी को दी थी। निषाद पार्टी ने यहां से छोटे सिंह को प्रत्याशी बनाया था, जो सपा के विनोद चतुर्वेदी से हार गए।
बुंदेलियों ने कांग्रेस को नकार दिया
क्षेत्र में कांग्रेस और बसपा का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। दोनों ही दल यहां खाता भी नहीं खोल पाए। कांग्रेस की स्थिति तो ये रही कि कहीं-कहीं हाथ का पंजा नोटा से संघर्ष करता नजर आया। जबकि, इस चुनाव में जमीन तैयार करने में कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। ललितपुर में खाद किल्लत के दौरान कुछ किसानों की मौत होने पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ललितपुर आईं थीं तथा किसानों के परिजनों से मिली थीं। आर्थिक सहायता भी दी गई थी। इतना ही नहीं कुछ किसानों को कांग्रेसियों ने खाद तक भिजवाई, बावजूद इसके, बुंदेलियों ने कांग्रेस को नकार दिया।
बीएसपी का वोट बैंक भी भाजपा के साथ आया
बुंदेलखंड की अगर बात करें तो 26 फीसदी दलित वोट हैं। इसी वोट के जरिए बसपा ने बुंदेलखंड की सियासी धरती को उपजाऊ बनाया था। लेकिन, भाजपा ने बसपा के इसी वोट बैंक में सेंधमारी कर दी। इस चुनाव में जिस तरह से बसपा प्रत्याशियों की स्थिति रही है उससे साफ है बसपा का वोट बैंक भी खिसककर भाजपा के साथ खड़ा हो गया। भाजपा की बड़ी जीत की एक वजह यह भी मानी जा रही है। यह भी माना जा रहा है कि बसपा ने इस चुनाव को बहुत कमजोर तरीके से लड़ा। लिहाजा, वोटर मान चुके थे कि उनकी पार्टी के प्रत्याशी तो चुनाव जीतेंगे नहीं इस कारण वे भाजपा के समर्थन में आ गए।