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बड़े लड़ैया गढ़ महोबे के इनसे हार गई तलवार...

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झांसी। बुंदेलखंड में बीते पच्चीस वर्ष पहले तक जब बारिश नहीं होती थी तो लोग चौपाल पर बैठकर आल्हा काव्य खंड का गायन करते थे, ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी लोकमान्यता रही है कि आल्हा ऊदल के चरित्र पर लिखा गया यह काव्य वीर रस से इतना ओतप्रोत है कि बारिश होने लगती है। जब गांव के लोग आल्हाखंड का काव्य पाठ करते हुए कहते है, बड़े लड़ैया गढ़ महोबे के इन से हार गई तलवार, तो वीर रस के कारण लोगों की भुजाएं फड़कने लगती हैं। ऐसा कहा जाता है कि वीर रस की गूंज के कारण गर्जना के साथ बादल बरसने लगते हैं। आल्हा और ऊदल राजा परमाल की सेना में सेनापति थे। इन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में 52 युद्ध लड़े। सबसे चर्चित युद्ध पृथ्वीराज चौहान और आल्हा ऊदल के बीच हुआ। इस काव्य खंड की रचना जगनिक ने की थी। आज भी बुंदेलखंड के गांवों और कसबों में दुकानों पर आल्हा काव्य खंड सहज ही उपलब्ध हो जाता है, पर वक्त के साथ अब इसका गायन धीरे धीरे गायब हो रहा है।
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महोबा में जब पृथ्वीराज चौहान से युद्ध हुआ तो आल्हा के छोटे भाई ऊदल समर मैदान में थे पृथ्वीराज चौहान से युद्ध करते हुए ऊदल वीरगति को प्राप्त हो गए। जब इसका पता उनके भाई आल्हा को लगा तो वह पृथ्वीराज की सेना पर बाज की तरह टूट पड़े। सैकड़ों सैनिकों के मारे जाने के साथ ही आल्हा ने पृथ्वीराज को गंभीर रूप से घायल कर दिया, मरणासन्न पृथ्वीराज का आल्हा प्रणांत करने वाले थे कि गुरु गोरखनाथ ने बीच में आकर आल्हा को रोकर पृथ्वीराज चौहान को जीवन दान दे दिया था। इसके बाद आल्हा ने नाथ संप्रदाय की दीक्षा लेकर बाकी जीवन व्यतीत किया।
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