झांसी। पुलिस कार्यालय के पीछे बने पुलिसकर्मियों के आवास दुर्दशा के शिकार हैं। बरसात का पानी कमरों में आने के कारण यहां रहना भी मुश्किल हो रहा है। आवासों की लंबे समय से मरम्मत न होने के कारण हर समय हादसे का डर पुलिसकर्मियों को सता रहा है।
पुलिसकर्मियों के रहने के लिए 500 आवास बने है, इनमें से आधे से ज्यादा काफी पुराने हैं। नवाबाद थाने के सामने बने सौ आवास बेहद जर्जर हैं। कुछ को कंडम घोषित करने के बाद भी पुलिस खाली नहीं करा सकी है। पुलिस लाइन से लेकर थानों और अग्निशमन स्टाफ तक के अधिकांश आवास जर्जर हैं। आवासों की जर्जर वायरिंग से बिजली के तार लटक रहे हैं, पानी की पाइप लाइन भी क्षतिग्रस्त है। छतें टूटी हुई हैं। अक्सर छतों से प्लास्टर टूटकर गिरता है। विभाग मरम्मत के लिए सीमित
बजट देता है और पुलिसकर्मी निजी खर्च से काम कराना नहीं चाहते। आवास भत्ता न्यूनतम होने और उसमें बिजली, पानी और सफाईकर्मी का व्यय शामिल होने की वजह से ऐसा होता है। अमर उजाला टीम ने शनिवार को पुलिस के आवासों का जायजा लिया तो ऐसे ही हालात सामने आए। महिलाओं ने अपने आवासों की दुर्दशा बताई।
सस्ते की वजह से नहीं छोड़ता स्टाफ
पुलिस विभाग की ओर से इन आवासों को टाइप वन, टू और थ्री श्रेणी में रखा गया है। वन श्रेणी सिपाही व निचले स्तर के स्टाफ के लिए और बाकी उससे ऊपर के स्टाफ को हैं। इसमें श्रेणी वन का मासिक किराया 640 रुपये, टू का किराया 1230 रुपये और इंस्पेक्टर व दरोगा रैंक वालों के लिए टाइप थ्री का किराया एकमुश्त 1930 रुपये तय है। इसी किराये में बिजली, पानी और सफाईकर्मी का व्यय शामिल है। आमतौर पर शहर में इतनी जगह वाले आवास, बिजली और पानी की सुविधा कम से कम छह हजार रुपये प्रतिमाह में मिलती है। इसीलिए पुलिसकर्मी इन्हें नहीं छोड़ते।