झांसी। आत्महत्या की कोशिश करना या अपने जीवन को खत्म कर देना आपकी और आपके परिवार की किसी भी समस्या को समाप्त नहीं कर सकता है। समस्या कैसी भी हो, उसका हल परिवार व संगी-साथियों के साथ शांतिपूर्वक बैठकर और सोच-विचार कर निकाला जा सकता है। यह मनोवैज्ञानिकों की सलाह है। उनका कहना है कि जिंदगी में सब कुछ खत्म हो जाने के डर से बाहर निकलें, अपनों से बात करें, क्योंकि हर समस्या के जिंदगी में हजारों समाधान हैं।
मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र पचकुइयां के वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. एलके सिंह और डॉ. मनीष मिश्रा बताते हैं कि एक सामान्य दिखने वाला व्यक्ति भी आत्महत्या कर सकता है, लेकिन ऐसा करने वाले व्यक्ति के व्यवहार में अचानक ही बदलाव दिखता है। वह मानसिक रूप से परेशान दिखने लगता है। डिप्रेशन में रहता है। खुद को खतम करने की बातें करने लगता है। उसका किसी बात में मन नहीं लगता। खाना, हंसना, बातें करना, लोगों के साथ मिलना-जुलना उसे अच्छा नहीं लगता। ऐसा व्यक्ति कुछ समय बाद खुद को खत्म करने का कोई न कोई तरीका ढूंढ लेता है। ऐसे में जरूरी है कि घरवाले या दोस्त ऐसा बदलाव परिवार के किसी भी सदस्य में देखें तो तुरंत मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक के पास ले जाएं। काउंसलिंग या इलाज में शर्म या झिझक महसूस न करें। मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र में सभी तरह की निशुल्क काउंसलिंग की जाती है। इसके अलावा डिप्रेशन स्तर, पर्सनालिटी टेस्ट, सोशल एवं फैमली एडजेस्टमेंट टेस्ट और आईक्यू टेस्ट भी निशुल्क किए जाते हैं।
इन नंबरों पर ऑनलाइन भी ले सकते हैं निशुल्क काउंसलिंग
डॉ. एलके सिंह- 9415948872
डॉ. मनीष मिश्रा -9415945627
झांसी में हर माह आठ से 10 केस, ललितपुर में आठ माह में 120 आत्महत्याएं
झांसी में हर माह आठ से 10 केस आ रहे हैं, वहीं ललितपुर में जनवरी से अब तक आठ महीने में 120 लोग आत्महत्या कर चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले पारिवारिक स्थिति, प्रेम संबंध, उम्मीद और परिस्थिति से ज्यादा हासिल करने की अपेक्षा और इम्पलसिव (आवेग) से जुड़े मिले हैं। मनोचिकित्सक डॉ. अर्जित के अनुसार आत्महत्या करने की दो स्टेज होती हैं। इसमें कुछ लोग आवेग में आकर किसी बात पर तुरंत किसी भी तरह खुद को खत्म कर लेते हैं। दूसरे स्टेज में सोच समझकर (प्लान्ड) सुसाइड आता है। जिसमें लोग आत्महत्या करने से पहले कोई विशेष दिन, समय व परिस्थिति चुनकर यह कदम उठाते हैं। यह कहीं न कहीं उनकी जिंदगी से जुड़ी खुशी या गम का पल होता है। इस तरह के केस में व्यक्ति को बचाना बहुत आसान होता है। क्योंकि इस तरह के मामलों में अक्सर व्यक्ति की दिनचर्या और व्यवहार में परिवर्तन देखने को मिलता है। इस बीच उस व्यक्ति को परिवार का साथ व सही परामर्श मिल जाए तो व्यक्ति को बचाया जा सकता है।
सही समय पर परिवार का साथ मिले तो रोक सकते हैं घटनाएं-
केस-1
झांसी। यह तीन वर्ष पहले का मामला है। मेडिकल कॉलेज झांसी में एमबीबीएस की एक छात्रा ने नंबर कम आने पर आवेग में आकर मेडिकल कॉलेज की बिल्डिंग से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। छात्रा के माता-पिता कानपुर आईआईटी कार्यरत हैं। आत्महत्या से पहले उसने घरवालों को फोन भी किया था कि नंबर कम आने से दुखी है और खुद को खत्म करने जा रही है। छात्रा ने नंबरों के प्रेशर में आवेग में आकर जान दे दी।
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केस-2
झांसी। शहर की एक युवती ने साइबर क्राइम के चलते आत्महत्या कर ली थी। युवती ने आत्महत्या से कुछ महीने पहले एक कंपनी में 48-50 हजार रुपये लगाए थे। कंपनी ने फ्राड किया तो पुलिस के पास जाने की बजाय युवती ने आत्महत्या करने का रास्ता चुन लिया और प्लान्ड सुसाइड के तहत एक दिन घर में आत्महत्या कर ली। वह गुमसुम थी लेकिन किसी ने उसकी समस्या पर गौर नहीं किया।
झांसी। विश्व में आत्महत्या के बढ़ते मामलों को देखते हुए डब्ल्यूएचओ और इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर सुसाइड प्रीवेंशन (आईएएसपी) ने मिलकर वर्ष 2003 में इसकी शुरूआत की थी। तभी से हर वर्ष 10 सितंबर को ‘विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस’ मनाया जाता है। इसका उदेश्य आत्महत्या रोकथाम के प्रति लोगों को जागरूक करना है। हर वर्ष इसकी एक थीम होती है। वर्ष 2021 की थीम ‘क्रियेटिंग होप थ्रू एक्शन-कार्रवाई के माध्यम से आशा बनाना’ है। नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार आत्महत्या करने वालों में 15-19 वर्ष और 19 से 45 वर्ष के बीच मृत्यु दर काफी ज्यादा है। दुनिया में हर वर्ष लगभग 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं।
इन्होंने जीती जिंदगी की जंग-
केस-1
झांसी। यह एक साल पहले की बात है, झांसी में रहने वाले एक युवा अपने घरवालों और दोस्तों से अक्सर कहता था कि वह मरना चाहता है, उसे जिंदा रहने की कोई चाह नहीं है, लेकिन उसकी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। इसी दौरान एक दिन उसने चलती गाड़ी से कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश की। उसे बचा लिया गया लेकिन वह बुरी तरह से घायल हो गया। परिवारवालों को तब समझ आया और वह उसे मनोचिकित्सक डॉ. अर्जित के पास ले गए। काउंसलिंग और दवाओं से वह युवा ठीक हो रहा है, उसका डिप्रेशन अब खत्म चुका है। वह सामान्य जिंदगी की तरफ अग्रसर है।
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केस-2
झांसी। तीन वर्ष पहले की बात है। मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र में एक केस आया, इसमें एक शादीशुदा व्यक्ति ने आत्महत्या की कोशिश की थी, परिवारवालों ने उसे बचा लिया। वह एचआईवी पॉजिटिव था, लेकिन वह मरना इसलिए चाहता था क्योंकि उसकी पत्नी और एक वर्ष का बेटा भी एचआईवी पॉजिटिव थे। इससे वह हीन भावना से ग्रस्त था और खुद को खत्म कर देना चाहता था। वह मनोवैज्ञानिक डॉ. मनीष मिश्रा के पास आया। कई बार काउंसलिंग और बीमारी की दवाओं से ठीक हो गया। उसका परिवार अब सामान्य जिंदगी जी रहा है।
मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की सलाह जरूर लें
परिवार या खुद से जरूरत से ज्यादा अपेक्षाएं, बाहरी दुनिया की चकाचौंध और धैर्य की कमी लोगों को आज निराशा की ओर ले जा रही है। इसलिए परिवार में जब भी कोई तनाव में दिखे, मिल बैठकर समस्या पूछें और निदान में सहयोग करें। उसे बताएं कि आत्महत्या कर लेने से समस्याएं कम नहीं होती हैं। हर समस्या अपने साथ कोई न कोई समाधान लेकर आती है। ललितपुर में आत्महत्या के मामले बढ़ने के पीछे भी लोगों में तनाव और धैर्य की कमी होना एक बड़ा कारण है।
डॉ. संजीव कुमार शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग, नेहरू महाविद्यालय, ललितपुर
कोई व्यक्ति अगर अचानक ही कहने लगे कि उसके जीवन में अब कुछ भी अच्छा नहीं होगा, वह मरना चाहता है। ऐसा व्यक्ति व्हाट्सएप व सोशल मीडिया पर शायरी, निराशा भरे कमेंट करने लगे या उसके व्यवहार में कुछ बदलाव हो तो समझ लेना चाहिए कि कुछ ठीक नहीं है। अगर परिवार में पहले किसी ने आत्महत्या की हो तो उस व्यक्ति की यह स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है। इस समय बहुत जरूरी होता है कि परिवार उसके साथ बात करे, उसे अकेला न छोड़ें और तुरंत बिना हिचक के मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से मिलें।
डॉ. अर्जित गौरव, मनोचिकित्सक, झांसी