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बिजली घोटाला: सोलह साल में आठ अफसरों के बयान तक नहीं लिए गए

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झांसी। राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना (ग्रामीण) में नामजद आठ अधिकारियों को हिरासत में लेने और पूछताछ की तो बात ही छोड़ दीजिए सोलह साल के भीतर किसी के बयान तक नहीं लिए गए। जबकि इन सभी पर करोड़ों के हेरफेर का आरोप है। न पुलिस ने कुछ किया और न ही विजिलेंस ने। अब जब हाईकोर्ट ने सख्ती की तो एजेंसियां दौड़ने लगीं हैं। गांवों का सत्यापन किया जा रहा है।
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प्रदेश के 12 जिलों में सन 2005 में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना का काम हुआ था। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली के खंभे, तार और ट्रांसफार्मरों पर मीटर लगाने जाने थे। केंद्र सरकार की इस योजना में अफसरों ने पलीता लगा दिया था। स्थिति यह बनी थी कि 87 प्रतिशत ट्रांसफार्मरों पर इलेक्ट्रानिक मीटर नहीं लगाए गए थे। जांच में शिकायत की पुष्टि होने पर 05 जुलाई 2019 को थाना नवाबाद में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। इसमें उप्र सतर्कता अधिष्ठान, सेक्टर- झांसी के निरीक्षक अजीत कुमार ने बिजली विभाग के अधिशासी अभियंता लोकेश कुमार, सहायक अभियंता प्रदीप कुमार सिन्हा व अनुभव कुमार, अवर अभियंता हरीश कुमार, जंग सिंह, भगवंत सिंह, शशिवेंद्र व योगेंद्र सिंह तथा आईबीआरसीएल इंफ्रास्ट्रक्चर एंड प्रोजेक्ट लिमिटेड हैदराबाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी।
लेकिन आरोपी अधिकारियों से अब तक पूछताछ नहीं की गई। इस पर हाईकोर्ट ने नाराजी व्यक्त की। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि विवेचना पूरी करने में देरी क्यों की जा रही है। ऐसे कौन से कारण हैं, जिनके चलते भ्रष्टाचार के आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है। कोर्ट ने घोटाले को गंभीर माना और कहा कि यदि संसाधनों की कमी के कारण संबंधित थाने की पुलिस विवेचना नहीं कर पा रही है तो सरकार दूसरी जांच एजेंसी को विवेचना स्थानांतरित कर दे। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आरोपी अधिकारी जमानत पर नहीं हैं तो उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया है। कोर्ट की सख्ती के बाद अब विजिलेंस द्वारा जांच शुरू कर दी गई है। सूत्रों के अनुसार विजिलेंस द्वारा गांवों का सर्वे कर रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
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14 साल में दर्ज हो सका मुकदमा
बिजली विभाग में हुए घोटाले की जांच के प्रति अधिकारी कितने संवेदनशील थे, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2005 के इस मामले में 14 साल बाद 2019 में एफआईआर दर्ज कराई गई। यह मामला सीधे जनता की जरूरत से जुड़ा हुआ है। बिजली लोगों की आवश्यकता बन गई है, लेकिन इसके बाद भी पैसे कमाने के चक्कर में अधिकारियों ने आंखें बंद कर ली थी। किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और इसी का नतीजा रहा कि 14 साल बाद एफआईआर दर्ज कराई जा सकी। अब, जब एफआईआर दर्ज हो गई है तो सभी अधिकारियों ने चुप्पी साध ली है। कोई कुछ भी बताने से इंकार कर रहा है। यही कारण है कि हाईकोर्ट को सख्ती बरतनी पड़ रही है।
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ऐसे तो चार्जशीट में लग जाएगा बहुत समय
राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना (ग्रामीण) में हुए गड़बड़झाला और हाईकोर्ट के निर्देश के बाद जांच में तेजी आ गई है, लेकिन जिस तरह से काम चल रहा है। उससे तो अभी चार्ज शीट दाखिल करने में बहुत समय लग जाएगा। सूत्रों की मानें तो एक दिन में अधिकतम दो खंभों की जांच की जा सकेगी। इसलिए नहीं लगता कि जल्द ही कुछ हो सकेगा। जांच के दौरान खंभा खोदकर उसमें ग्राउटिंग की टेस्टिंग की जाएगी। जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की जाएगी। इस कारण अभी जांच होने में कुछ और समय लग सकता है।
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साक्ष्य हो गए होंगे मटियामेट
योजना के अंतर्गत जांच में हुई गड़बड़ी में ट्रांसफार्मर पर इलेक्ट्रानिक मीटर नहीं लगे पाए गए थे, खंभों को पांच फिट की गहराई तक गाड़ा जाना चाहिए था और ग्राउटिंग (खंभों को सीमेंट में जाम करना) कम पाई गई थी, कंक्रीट का मिक्चर कम डाला गया था। खंभों के नीचे स्टोन पैड नहीं डाले गए थे। दिलचस्प बात यह है कि 2005 से लेकर अब तक गांवों में बिजली की अन्य योजनाओं के माध्यम से भी काम हुआ है। ऐसे में तय कर पाना मुश्किल है कि वास्तव में 16 साल पहले क्या किया गया होगा। हालांकि, अधिकारियों का तर्क है कि गांव में बिजली जल रही है इसलिए यह माना जाना चाहिए कि गड़बड़ी नहीं हुई है।
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