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डा. वृंदावन लाल वर्मा ने दी हिंदी उपन्यास को विश्वव्यापी पहचान

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झांसी। बुंदेलखंड की धरती पर जन्मे डा. वृंदावन लाल वर्मा को हिंदी उपन्यास जगत का वाल्टर स्कॉट कहा जाता है। इनके उपन्यासों में वैसे तो खड़ी बोली का प्रयोग है, पर विषयवस्तु और पात्रों का तानाबाना बुंदेलखंड व आसपास की ऐतिहासिक कथाओं को लेकर ही बुना गया हैे। जब पारिवारिक व सामाजिक उपन्यास लिखे जा रहे थे, इसी दौर में अंग्रेजी उपन्यासकार वाल्टर स्कॉट के ऐतिहासिक उपन्यासों की धूम थी। डा. वृंदावन लाल वर्मा ने ग्वालियरके तोमर राजा मान सिंह व गूजर की बेटी मृगनयनी की ऐतिहासिक प्रेम कथा को केंद्र में रखकर उपन्यास की रचना की और वे रातों रात वाल्टर स्कॉट के समकक्ष जा खड़े हुए। इसके बाद उन्होंने गढ़ कुंडार, विराटा की पद्मनी जैसे उपन्यास लिखकर ऐतिहासिक उपन्यासों को उत्कर्ष तक पहुंचाया।
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ऐतिहासिक तानेबाने के बीच भी नहीं किया राजाओं का महिमा मंडन
इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि हिंदी साहित्य जगत में सबसे पहले ऐतिहासिक उपन्यास लिखने का श्रेय डा. वृंदावन लाल वर्मा को ही जाता है। पर, अंग्रेजी उपन्यासकार और वर्मा जी के बीच थोड़ा अंतर है जहां अंग्रेजी उपन्यासकारों ने ऐतिहासिक पात्रों को लेकर जो लेखन किया उसमें राजाओं का महिमा मंडन किया गया है, जबकि डा. वृंदावन लाल वर्मा ने ऐतिहासिक घटनाक्रमों का अपने उपन्यासों में समावेश तो किया पर राजाओं का महिमा मंडन कतई नहीं किया है। उनके लेखन में महिला पात्रों के शौर्य और बलिदान की गाथाए लिखीं गई हैं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण उनका उपन्यास झांसी की रानी है। उन्होंने जहां समकालीन इतिहास के चित्रों को बड़े ही खूबसूरती के साथ खींचा तो वहीं इनके उपन्यासों में समाजवाद का भी दर्शन होता है। राजा मान सिंह सिर्फ इस बात से गूजर की पुत्री मृगनयनी पर रीझ जाते हैं कि वह एक अच्छी शिकारी और निशानेबाज थी। इस उपन्यास में शिकार के जो चित्र वर्मा जी ने खींचे हैं वह उन्हें एक अच्छे शिकारी के रूप में साबित करते हैं।
मैथिली शरण गुप्त और वृंदावन लाल वर्मा की रही बेमिसाल जोड़ी
हिंदी साहित्य जगत में बुंदेलखंड के दो लाल मैथिलीशरण गुप्त और डा. वृंदावन लाल वर्मा की दोस्ती के किस्से आज भी लोग सुनाते हैं। डा. वृंदावन लाला वर्मा के पौत्र लक्ष्मीकांत वर्मा बताते हैं कि जैसे ही राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के निधन का समाचार डा. वृंदावन लाल वर्मा को मिला तो उन्होंने रुंधे हुए गले से कहा था कि मुझे वृंदावन कहकर बुलाने वाला अब इस दुनिया में नहीं रहा। उन्होंने बताया कि चाहे घर में शादी हो या फिर अन्य समारोह वर्मा जी मैथिलीशरण गुप्त को बड़े भाई का दर्जा देते थे तथा उनकी सलाह से ही सारे काम हुआ करते थे। समय-समय यहां हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा जैसे बड़े साहित्यकारों का आना जाना लगा रहता था, और इनकी गोष्ठियां या तो चिरगांव में बड़ी बखरी में होती थी या फिर वृंदावन लाल वर्मा के झांसी निवास पर। वर्मा जी का सहकारिता के क्षेत्र में विशेष योगदान रहा है, उनका उपन्यास टूटे कांटे भी सहकारिता क्रांति में मील का पत्थर है।
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